gudi padwa

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (gudi padwa) से नवमी तक का महत्त्व

gudi padwa, ugadi

चैत्र, आषाढ़, अश्वनि,और माघ के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से नवमी तक के नो दिन नवरात्र कहलाते हैं | इस प्रकार एक सम्बत्सर में चार नवरात्र होते हैं, इनमें चैत्र का नवरात्र ‘वासंतिक नवरात्र’ (gudi padwa) और अश्विन का नवरात्र ‘शारदीय नवरात्र’ कहलाता है | इनमें आदि शक्ति भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है |

पूजा विधि – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (Gudi padwa) से पूजा आरम्भ होती है | सर्व प्रथम स्वयं स्नानादि से पवित्र हो गोमय से पूजा स्थान का लेपन कर उसे पवित्र कर लेना चाहिए | तत्पश्चात घट स्थापन करने की विधि है | घट स्थापन प्रातः करना चाहिए | परन्तु चित्रा या वैधृति योग हो तो उस समय घट स्थापन न कर मध्यान्ह में अभिजित आदि शुभ मुहूर्त में घट स्थापन करना चाहिए | घट स्थापन करते समय मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना चाहिए संभव हो तो किसी योग्य जानकर ब्राम्हण से शुभ मुहूर्त में घट स्थापना कराएं |

           यह (Gudi padwa) का व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं | यदि स्वयं न कर सकें तो पति, पत्नी, पुत्र या ब्रम्हाण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है | व्रत में उपवास करना या रात में एकबार भोजन करना – जो बन सके यथासामर्थ वह करें |

          घट स्थापन के लिए पवित्र मिटटी से वेदी का निर्माण करें, फिर उसमे जौ और गेंहूं बोयें तथा उस पर कलश स्थापित करें | कलश पर देवी की मूर्ति स्थापित करें तथा उनका षोडशोपचार पूर्वक पूजन करना चाहिए | तदनंतर श्रीदुर्गासप्तशती का सम्पुट अथवा साधारण पाठ भी करने की विधि है | पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन अथवा दशांश पाठ करना चाहिए |

श्रीदुर्गासप्तशती पाठ विधि जानने के लिए इसे पढ़ें |

दीपक स्थापन – पूजा के समय घृत का दीपक भी जलाना चाहिए तथा उसकी गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजा करना चाहिए | दीपक स्थापन का मन्त्र इस प्रकार हैं –

भो दीप ब्रह्मरूप त्वं अन्धकारविनाशक ।

इमां मया कृतां पूजां गृह्वन्तेज : प्रवर्धय ॥

  कुछ लोग अपने घरों में दीवार पर अथवा चौकी पर चित्र बनाकर इस चित्र की तथा घृत दीपक द्वारा ज्योति की पूजा अष्टमी अथवा नवमी तक करते हैं |

gudi padwa

                                                                                                                  gudi padwa

             व्रती के लिए कुमारी पूजन नवरात्र का अनिवार्य अंग है | कुमारिकाएँ जगज्जननी जगदम्बा का प्रत्यक्ष विग्रह हैं | सामर्थ्य हो तो नो दिन तक नो, अन्यथा सात, पांच, तीन या एक कन्या को देवी मानकर पूजा करके भोजन कराना चाहिए | आसन बिछाकर कुमारियों को एक पंक्ति में बिठाकर ॐ कुमार्यै नमः मन्त्र से कुमारियों का पंचोपचार पूजन करें | इसके बाद हाँथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से कुमारियों की प्रार्थना करें –

मंत्राक्षरमयी लक्ष्मी मातृणा रुपधारिणीम |

नवदुर्गात्मिकां साक्षात कन्यामावाहयाम्यहम ||

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्दे सर्वशक्ति स्वरुपणी |

पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते ||

            कहीं कहीं अष्टमी या नवमी के दिन कड़ाही पूजा की भी परंपरा है | कड़ाही में हलुवा बनाकर उसे देवी जी की प्रतिमा के सम्मुख रखा जाता है | तत्पश्चात चमचे और कड़ाही में मौली बांधकर अन्नपूर्णायै नमः इस नाम मन्त्र से कड़ाही का पंचोपचार पूजन भी किया जाता है | तदनन्तर थोड़ा सा हलुआ कड़ाही से निकालकर देवी माँ को नैवेद्ध लगाया जाता है | उसके बाद कुमारी बालिकाओं को भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति वस्त्राभूषण, दक्षिणादि देने का विधान है |

विसर्जननौ रात्रि ब्यतीत होने पर दसवें दिन विसर्जन करना चाहिए | विसर्जन से पूर्व भगवती दुर्गा का गंध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजन कर निम्न प्रार्थना करनी चाहिए |

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवती देहि मे |

पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान कामांश्र्च देहि मे ||

महिषघ्नी महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी |

आयुरारोग्यमैश्र्वर्यं देहि देवी नमोस्तु ते ||

इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद हाँथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर भगवती का निम्न मन्त्र से विसर्जन करना चाहिए |

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानम् परमेश्र्वरि |

पूजाराधनकाले पुनरागमनाय ||

       इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ माता भगवती की नव दिन तक आराधना करना चाहिए | तथा नव दिन तक माता भगवती से सम्बंधित चरित्र पढ़ना एवं सुनना चाहिए | हे माँ जगत्जननी सारे संसार पर कृपा दृष्टि बनाये रखना यही प्रार्थना करना चाहिए |

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