गुरुवार व्रत कथा (guruvar vrat katha)

guruvar vrat katha – व्रत की सही विधि कथा सहित

guruvar vrat katha – गुरुवार व्रत करने के लिए जिस गुरुवार को अनुराधा नक्षत्र हो उसी दिन से व्रत आरम्भ करें | प्रथम गुरु की पूजा करें, पीतल के पात्र में बृहस्पति जी की मूर्ति स्थापित करें, तथा दो पीताम्बरी उढावे, पीला जनेऊ पहनावें | पीले फूलों से शुसोभित करके कुमकुम का लेप करें, और धूप, दीप, फल, चन्दन, चावल, मिष्ठान्न, उपहार आदि से यथा संभव पूजन करना चाहिए | तत्पश्चात हे धर्मशास्त्र के तत्व को जानने वाले ! हे ज्ञान और विज्ञानं के पारदर्शी ! देवताओं के कष्ट को नष्ट करने वाले ! देवों के आचार्य ! आपको नमस्कार है | इस प्रकार बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए |

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हवन :-

घृत तिल से हवन करना चाहिए | पीपल की समिधा का उपयोग करना चाहिए | समिधा 108 या 28 होनी चाहिए | यह व्रत महापुन्यदायक सब पापों को हरने वाला कल्याणकारी है |

जब गुरु विषम स्थिति में हों तब इनकी शान्ति अवश्य करनी चाहिए | गुरु का वैदिक मन्त्र – ॐ बृहस्पते अतियदर्य्यो अर्हाद्धुम ऋतूमज्जनेशु, यद्दीदयच्छ वसाऋत प्रजात तदस्मासु द्रवणम धेहि चित्रम |

बृहस्पति जी का तांत्रिक मन्त्र – ॐ बृं बृहस्पतये नमः | ध्यान रखें (guruvar vrat katha) के पश्चात हवन वैदिक मन्त्र से करना चाहिये |

गुरुवार व्रत कथा :- (guruvar vrat katha)

एक गाँव में एक साहूकार रहता था, जिसके घर में अन्न, वस्त्र और धन किसी की कोई कमी नहीं थी | परन्तु उसकी स्त्री बहुत ही कृपण थी | किसी भी भिक्षार्थी को कुछ नहीं देती थी | सारे दिन घर के काम काज में लगी रहती | एक समय एक साधू महात्मा गुरुवार के दिन उसके द्वार पर आये, और भिक्षा की याचना की | स्त्री उस समय घर के आँगन को लीप रही थी | इस कारण साधू महाराज से कहने लगी कि महाराज इस समय तो में घर लीप रही हूं आपको कुछ नहीं दे सकती | फिर किसी अवकास के समय आना | साधू महात्मा खाली हाँथ चले गए |

कुछ दिन के पश्चात् वाही साधू महाराज आये | उसी तरह भिक्षा मांगी | साहुकारनी उस समय लडके को खिला रही थी | कहने लगी – महाराज में क्या करूँ अवकाश नहीं है, इसलिए आपको भिक्षा नहीं दे सकती | तीसरी बार महात्मा आये तो उसने उन्हें किसी तरह से टालना चाहा परन्तु महात्मा जी कहने लगे कि यदि तुमको बिलकुल ही अवकाश हो जाए तो मुझे भिक्षा दोगी ?

साहूकारानी कहने लगी कि हाँ महाराज यदि ऐसा हो जाये तो आपकी पड़ी कृपा होगी | साधू महात्मा जी कहने लगे कि अच्छा में एक उपाय बताता हूं | तुम गुरुवार को दिन चढने पर उठो और सारे घर में झाड़ू लगाकर कूडा एक कौने में जमा करके रखदो | घर में चौका इत्यादि मत लगाओ | फिर स्नान आदि करके घर वालों से कह दो, उस दिन सब हजामत अवश्य बनवाएं | रसोई बनाकर चूल्हे के पीछे रखा करो, सामने कभी न रखो | सायं काल को अधेरा होने के बाद दीपक जलाया करो तथा गुरुवार को पीले वस्त्र मत धारण करो, न पीले रंग की चीजों का भोजन करो | यदि ऐसा करोगे तो तुनको गहर का कोई काम नहीं करना पड़ेगा |

साहूकरानी ने ऐसा ही किया | गुरुवार को दिन चढ़े उठी, झाड़ू लगाकर कूड़े को जमा कर दिया, पुरुषों ने हजामत बनवाई, भोजन बनाकर चूल्हे के पीछे रखा | वह सब बृहस्पतिवार को ऐसा ही कराती रही | अब कुछ काल बाद उसके घर में खाने का दाना न रहा | थोड़े दिनों में महात्मा फिर आए और भिक्षा मांगी, परन्तु सेठानी ने कहा महाराज मेरे घर में खाने को अन्न नहीं है, आपको क्या दे सकती हूं | तब महात्मा ने कहा कि जब तुम्हारे घर में सब कुछ था तब भी तुम कुछ नहीं देतीं थीं | अब पूरा-पूरा अवकाश है तब भी कुछ नहीं दे रही हो , तुम क्या चाहती हो वह कहो |

तब सेठानी ने हाँथ जोड़कर प्रार्थना की कि महाराज अव कोई ऐसा upay बताओ कि मेरे पास पहले जैसा धन-धान्य हो जाय | अब में प्रतिज्ञा कराती हूं, कि अवश्य ही जैसा आप कहेंगे वैसा ही करुँगी | तब महात्मा जी ने कहा – गुरुवार को प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो घर को गोउ के गोबर से लीपो, तथा घर के पुरुष हजामत न बनवाएं, भूखों को अन्न जल देती रहा करो | ठीक सायं काल दीपक जलाओ, यदि ऐसा करोगी तो तुम्हारी सब मनोकामनाएं भगवान ब्रिहस्पतिजी की कृपा से पूर्ण होंगी | सेठानी ने ऐसा ही किया और उय्सके घर में धन-धान्य वैसा ही हो गया जैसे पहले था | इस प्रकार भगवान बृहस्पति जी की कृपा से अनेक प्रकार के सुख भोगकर दीर्घकाल तक जीवित रही |

गुरुवार व्रत की दूसरी कथा :- (guruvar vrat katha)

एक दिन इंद्र बड़े अहंकार से अपने सिंहासन पर बैठे थे, और बहुत से देवता, ऋषि, गन्धर्व, किन्नर आदि सभा में उपस्थित थे | उसी समय बृहस्पति जी वहां पर आये तो सबके सब उनके सम्मान के लिए खड़े हो गए परन्तु इंद्र गर्व के मारे खड़ा न हुआ, यद्दपि वह सदैव ही उनक आदर किया करता था |

बृहस्पति जी अपना अनादर समझते हुए उहाँ से उठकर चले गए | तब इंद्र को बड़ा शोक हुआ, की देखो कि देखो मैंने गुरूजी का अनादर कर दिया, मुझ से बड़ी भरी भूल हो गयी | गुर्जी के आशिर्बाद से ही मुझको यह वैभव मिला है | उनके क्रोध से यह सब नष्ट हो जायेगा | इसलिए उनके पास जाकर उनसे क्षमा मांगनी चाहिए | जिससे उनका क्रोध शांत हो जाय और मेरा कल्याण होवे | ऐसा विचार कर इंद्र उनके स्थान पर गए | जब बृहस्पति जी ने अपने योगबल से यह जान लिया कि इंद्र क्षमा माँगने के लिए वहां आ रहा है तब क्रोध वस उनसे भेट करना उचित न समझकर अंतर्ध्यान हो गए  |

जब इंद्र ने बृहस्पति जी वहां न देखा तब निराश होकर लौट आये | जब दैत्यों के राजा वृषवर्मा को यह समाचार विदित हुआ तो उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से इंद्रपूरी को चारों तरफ से घेर लिया | गुरु की कृपा न होने के कारण देवता हारने व मार खाने लगे | तब उनहोंने ब्रम्हा जी को विनय पूर्वक सब ब्रितांत सुनाया और कहा कि महाराज दैत्यों से किसी प्रकार बचाइए | तब ब्रम्हा जी कहने लगे – इंद्र तुमने बड़ा ही अपराध किया है जो गुरुदेव को क्रोधित कर दिया | अब तुम्हारा कल्याण इसी में हो सकता है कि त्वष्टा ब्रम्हाण का पुत्र विश्वरूपा बड़ा तपस्वी और ज्ञानी है | उसे अपना पुरोहित बनाओ तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है |

यह वचन सुनते ही इंद्र त्वष्टा के पास गए और बड़े ही विनीत भाव से त्वष्टा से कहने लगे, आप हमारे पुरोहित बनाने की कृपा करें, जिससे हमारा कल्याण हो | तब त्वष्टा ने उत्तर दिया कि पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है, परन्तु तुम बहुत बिनती कर रहे हो, इसलिए मेरा पुत्र विश्वरूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा | विश्वरूपा ने पिता की आज्ञा से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया कि हरी इच्छा से इंद्र बृषवर्मा को युद्ध में जीतकर अपने इन्द्रासन पर स्थित हुआ |

विश्वरूपा के तीन मुख थे | एक मुख से वह सोमपल्ली लता का रस पीते थे | दुसरे मुख से वह मदिरा पीते थे और तीसरे मुख से अन्नादि भोजन करते थे | इंद्र ने कुछ दिनों उपरांत कहा कि में आपकी कृपा से यज्ञ करना चाहता हूं | जब विश्वरूपा की आज्ञा अनुसार यज्ञ प्रारंभ हो गया तब एक दैत्य ने विश्वरूपा से कहा कि तुम्हारी माता दैत्य की कन्या हैं | इस कारण हमारे कल्याण के निमित्त एक आहुति दैत्यों के नाम पर भी दे दिय करो तो अति उत्तम बात है | विश्वरूपा उस दैत्य का कहा मानकर आहुति देते समय दैत्य नाम भी धीरे से लेने लगे | इसी कारण यज्ञ करने में देवताओं का तेज नहीं बढ़ा | इंद्र ने यह वृतांत जानते ही क्रोधित होकर विश्वरूपा के तीनों sir काट डाले | मद्धपान करने से भंवरा, सोमपल्ली पीने से कबूतर और अन्न खाने के मुख से तीतर बन गया |

विश्वरूपा के मरते ही इंद्र का स्वरूप ब्रम्ह हत्या के प्रभाव से बदल गया | देवताओं के एक वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रम्ह हत्या का वह पाप न छूटा तो सब देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रम्हा जी बृहस्पति जी के सहित वहां आये | उस ब्रम्ह हत्या के चार भाग किये | उनमे से एक भाग पृथ्वी को दिया | इसी कारण कहीं-कहीं धरती ऊंची नीची और बीज बोने के लायक भी नहीं होती | साथ ही ब्रम्हा जी ने यह वरदान दिया जहां पृथवी में गड्डा होगा, कुछ समय पाकर वह स्वयं भर जाएगा |

दूसरा भाग वृक्षों को दिया जिससे उनमे से गोंद बनकर बहता है | इस कारण गूगल के अतिरिक्त सभी गोंद अशुद्ध समझे जाते हैं | वृक्षों को यह वरदान दिया कि ऊपर से सूख जाने पर जड़ फिर से फूट जाती है | तीसरा भाग स्त्रियों को दिया, इसी कारण स्त्रियाँ हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चांडालिनी, दूसरे दिन ब्रम्हघातिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होतीं हैं | और संतान प्राप्ति का उनको वरदान दिया | चौथा भाग जल को दिया, जिससे फैन और सिवाल आदि जल के ऊपर आ जाते हैं | जल को यह वरदान मिला कि जिस चीज में डाला जायेगा, वह बिझ में बढ़ जायेगा | इस प्रकार इंद्र को ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त किया | जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सब पाप बृहस्पति जी कृपा से नष्ट हो जाते हैं |

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