प्रदोष व्रत कथा (pradosh vrat katha)

सर्व अरिष्ट निवारक प्रदोष व्रत (pradosh vrat katha)

श्री स्कन्द पुराण के ब्रम्होत्तर खण्ड में भूतभावन भगवान शंकर की आराधना क्रम में प्रदोषकाल परम पवित्र मन गया है “प्रदोषो वै राजनिमुख़म” प्रदोषकालिक व्रतानुष्ठान होने के कारण इस व्रत का नाम है – प्रदोषव्रत | इसका अनुष्ठान त्रयोदशी तिथि को होता है | इस व्रत का निष्ठापूर्वक आचरण करने से निर्धन धनवान, मुर्ख विद्वान, पुत्रहीन पुत्रवान, और म्रियमाण आयुष्मान हो जाते हैं | भाग्यहीना बालिकाएं सुलक्षणवती और सुहागनें अखण्ड सौभाग्यवती हो जातीं हैं | शास्त्रों में इस (pradosh vrat katha) की बड़ी महिमा पाई गयी है |

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अनुष्ठान विधि

प्रदोषव्रत का अनुष्ठान करने वाले साधक को त्रयोदशी को दिन भर भोजन नहीं करना चाहिए | सायंकाल सूर्यास्त से तीन घडी पूर्व स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए | पूजन स्थल को स्वच्छ जल एवं गोबर से लीपकर वहां मण्डप बना लेना चाहिए | उस स्थान पर पांच रंगों के मिश्रण से पद्मपुष्प की आकृति बनाकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठना चाहिए | भगवान शंकर की दिव्य मूर्ति का ध्यान करना चाहिए | पंच्चाक्षरी मन्त्र – “ ॐ नमः शिवाय “ का जप करते हुए भगवान का पंचोपचार, षोडशोपचार यथा शक्ति पूजन करना चाहिए | तत्पश्चात (pradosh vrat katha) श्रवण करना चाहिए |

(pradosh vrat katha) प्रदोष व्रत कथा

विदर्भनगर में राजा विदर्भराज राज्य करते थे | शाल्वदेश के राजा ने विदर्भनगर पर चढ़ाई करदी जिसमे विदर्भराज की मृत्यु हो गयी | उनकी पत्नि उस समय गर्भवती थीं | विदर्भराज की पत्नि गर्भरक्षा के लिए रात्रि में महल छोड़कर जंगल की ओर चलीं गयीं | एक नदी के किनारे पुत्र रत्न को जन्म दिया किन्तु एक दिन पानी पिने के लिए नदी गयीं जहाँ पर एक ग्राह ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया | नन्हा सा बालक रुदन करने लगा |

उसी समय वहां से एक गरीब ब्रम्हाणी भिक्षाटन करके अपने शिशु के साथ आ रही थी | उसकी नजर उस बिलखते हुए बालक पर पड़ी वह यहाँ- वहां बालक के परिजनों की प्रतीक्षा करने लगी | तभी वहां से एक साधू आते दिखाई दिए | ब्रम्हाणी ने साधू को प्रणाम किया | संत ने आशीर्वाद दिया तथा ब्रम्हाणी के मन की बात जानकर उनसे कहा | हे ब्राम्हणी विधि का यही विधान है तुम इसे अपने साथ ले जाओ तुम्हारा कल्याण होगा | इतना कहकर साधू वहां से चले गए |

ऋषि संग का प्रभाव

एक दिन भक्तशिरोमणि ऋषि शांडिल्य घूमते-घूमते उस ग्राम में आ पहुंचे | कोमलचित्त कृपालु मुनि ने अपने उपदेश क्रम में भगवान शिव के स्वभाव और गुणों का विस्तृत वर्णन किया | ऋषि के वचनों ने ब्राम्हणी को भक्ति विह्वल कर दिया |

अपने दोनों पुत्रों को महर्षि के चरणों में समर्पित करते हुए उनसे निवेदन किया – हे मुनीश्वर मेरे ये दोनों पुत्र पितृहीन हैं | इनमे से एक शुचिव्रत मेरा औरस पुत्र है और दूसरा राजसुत मेरा पालित पुत्र है | इसका नाम धर्मगुप्त है | अपनी कृपा द्रष्टि से इनका कल्याण कीजिये |

ब्राम्हणी के शील-सद्भाव से प्रसन्न ऋषिवर ने उन लोगो को वर्षपर्यंत शिवार्चन का परामर्श देकर व्रत विषयक सम्पूर्ण नियमों को समझा दिया और शिव –शिव जपते हुए अपने गंतव्य स्थल की ओर प्रस्थान कर गए | कुछ ही क्षणों का यह संयोग पूण्यफलप्रद हुआ |

गुरु उपदेश से लाभ

वे तीनों एक मन्दिर में जाकर शिवार्चन क सात्विक आनंद प्राप्त करने लगे | गुरु के उपदेश से उनेक ज्ञानचक्षु खुल गए | पूजा अनुष्ठान करते हुए उनके चार मास ब्यातित हो गए | एक दिन शुचिव्रत अकेले ही गंगा तट पर स्नान करने गया और नदी में स्नान करने लगा | उसी समय नदी की धरा में बहता हुआ एक स्वर्ण कलश उसे दिखाई पड़ा |

शुचिव्रत ने उस कलश को उठा लिया और अपनी माँ के पास आया | उसने माँ से कहा – देखो माँ आज में क्या लाया हूं ? अब हम लोगों के कष्ट मिट जायेंगे | देवाधिदेव शंकर जी की कृपा अपार है | उस रत्न भरे कलश को देखकर ब्राम्हणी के हर्ष का ठिकाना न रहा | उसने शुचिव्रत से कहा देखो पुत्र इस दिव्य धनराशी को तुम दोनों आपस में बाँट लो | शुचिव्रत ने सहर्ष माता के आदेश को मान लिया किन्तु राजसुत ने माता से आग्रह किया हे दयामयी माँ भाई शुचिव्रत को यह धन उसके पूण्य से प्राप्त हुआ है इसलिए इस धन पर उसका ही अधिकार है | माता ने जैसी तुम्हारी इच्छा – बोल दिया

तपस्वियों को कहाँ नहीं ठहरना चाहिए

कालान्तर में वसंत ऋतु का समागम होने पर दोनों भी एक दिन वन का अवलोकन करते हुए बहुत दूर तक निकल गए | वहां उन्होंने देखा कि हजारों गन्धर्व कन्यायें इस निर्जन वन में क्रीडा कर रहीं हैं | तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा |

शुचिव्रत न कहा – यहाँ गन्धर्व कन्यायें क्रीड़ारत हैं अतः हम तपस्वियों को यहाँ नहीं ठहरना चाहिए | किन्तु देवी प्रेरणावश राजपुत्र ने उसके परामर्श को नकार दिया | वह अकेले ही मुस्कराते हुए उनके समूह में चला गया | उस सुदर्शन राजसुत को देखकर गन्धर्व कन्याओ को परम विस्मय हुआ | उनकी राजकुमारी तो उसके रुपाकर्षण से अभिभूत हो उठी | उसने अपनी सहेलियों को आगे बढ़कर वन से शिव पूजनार्थ दिव्य फूल तोड़ लेन को कहा | उनके चले जाने के बाद उसने राजकुमार की अभ्यर्थना कर उसे आसन प्रदान कर उससे परिचय विषयक प्रश्न किये |

सचचाई का फल

राजकुमार ने गन्धर्व कन्या को अपनी स्थिति से अवगत कराते हुए कहा – हे कल्याणि में विदर्भ नरेश का पुत्र हूं | मेरे माता- पिता दिवंगत हो चुके हैं | अवसर पाकर शत्रुओं ने मुझे राजच्युत कर दिया है | में जंगल में अपनी धर्ममाता के साथ जीवन यापन कर रहा हूं | सम्पूर्ण वृदान्त जान कर गन्धर्व राजकन्या प्रसन्न हो उठी और उसने उससे विवाह विषयक अपनी मनोभिलाषा प्रकट करते हुए कहा – हे राजपुत्र में विद्रविक नमक गन्धर्व की पुत्री अंशुमती हूँ |

में आपकी चिरसंगनी बनना चाहती हूं | राजकुमार उसका प्रेम प्रस्ताव सुनकर प्रसन्न तो हुआ किन्तु उसने गन्धर्व कन्या से कहा – देवी आपका प्रस्ताव मनोरम तो है, किन्तु कहाँ तो आप एक गन्धर्व कन्या और कहाँ में एक निर्वासित राजकुमार तथा दूसरा वैवाहिक सम्बन्ध माता-पिता की सहमति से ही संपन्न होना चाहिए | उसका विवेक सांगत उत्तर सुनकर कन्या ने उसकी धर्मबुद्धि की सराहना की तथा कहा कि वह गन्धर्वराज की अनुमति लेकर ही ऐसा करेगी | वे उसके चयन को सहर्ष स्वीकार कर लेंगे | उसने अपने गले का हार राजकुमार को पहनाते हुए कहा – हे पुरुषप्रवर कल आप इसी समय यहाँ उपस्थित हों | में पिताजी के साथ चली आऊँगी |

भगवान की कृपा से राज्य की प्राप्ति

दुसरे दिन शुचिव्रत, उसकी माँ तथा राजकुमार के वहां पहुँचने पर गन्धर्वराज ने अपनी कन्या का पाणिग्रहण करते हुए राजकुमार से कहा – हे पुत्र चिंता मत करो | भगवान शंकर ने मुझे तुम्हारी सहायता करने का आदेश देते हुए तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया है | में सब प्रकार से तुम्हारी सहायता करूँगा | हर्ष- गदगद राजकुमार और उसकी ब्राम्हणी माता ने गन्धर्वराज का आभार माना और शिवकृपा से राजकुमार ने अपना नष्ट वैभव पुनः प्राप्त कर लिया |

उसने शुचिव्रत को अपना मंत्री बना लिया तथा अपनी पालिका माता को राजमाता के पदपर प्रतिष्ठित किया | उन दोनों के दी आनंद से बितान लगे | प्रदोषव्रत प्राणिमात्र के लिए अभीष्टप्रद एवं भुक्ति-मुक्ति दायक है | जो लोग इस व्रत पालन करते हैं वे दुःख दारिद्र्य महाजाल में नहीं फसते और अंत में भगवान के लोक को प्राप्त करते हैं |

उद्यापन विधि

व्रत उद्यापन क्रम में गणेश पूजन सहित उमा-महेश्वर का विधिवत पूजन संपन्न कर 108 बार मंत्रोचारपूर्वक खीर से हवन करना चाहिए | हवानोपरांत ब्राम्हण भोजन कराकर आशिर्बाद लेना चाहिए |

इति श्रीस्कंदपुरणानुसार प्रदोषव्रत समाप्त

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