sankat nashan ganesh stotram,संकट नाशक गणेश स्त्रोतम

संकट नाशक गणेश स्त्रोत के लाभ

sankat nashan ganesh stotram, श्री गणेशजी वेद शास्त्रों में प्रथम पूज्य माने जाते हैं | प्रायः सभी शास्त्रों में प्रथम बन्दना गणेशजी की होती है | मानव जीवन में होने वाले समस्त प्रकार के कार्यों में सर्वप्रथम गणेश जी की ही आराधना की जाती है | बिना गणेश स्मरण के किसी भी कार्य का आरम्भ नहीं किया जाता |

sankat nashan ganesh stotram
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भगवान श्रीगणेश जी की पूजा के अनेक मन्त्र शास्त्रों में वर्णित हैं | हमारे मत से शास्त्रोक्त मन्त्र सभी के वश की बात नहीं है | इसलिए हमें नाम मन्त्र से ही भगवान की पूजा करनी चाहिए | जिसको वैदिक मन्त्र आते है अति उत्तम है और जिनको नहीं आते वो नाम मन्त्र से पूजन कर सकते हैं | क्योंकि पूजन में मन्त्र से ज्यादा भाव की आवश्यकता होती है |

श्री गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं |

तुलसीं वर्जयित्वा सर्वाण्यपि पत्र पुष्पाणि गणपतिप्रियाणी | आचार्यभुषण)

गणेशजी को दुर्वा अधिक प्रिय है | अतः इन्हीं हरी या सफ़ेद दुर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिए |

हरिताः स्वेतवर्णा वा पंचत्रिपत्रसंयुताः |

दूर्वांकुरा मया दत्ता एकविंशतिसम्मितः || 

दूर्वा की फुनगी में तीन यह पांच पट्टी होनी चाहिए | गणपति पर तुलसी कभी न चढ़ाएं | पद्मपुराण, आचार्यरत्न में लिखा है कि “न तुलस्या गणाधिपम ” अर्थात तुलसी से गणेशजी की पूजा कभी न की जाय | कार्तिक माहात्म्य में  भी कहा है कि “गणेशं तुलसीपत्रै दुर्गां नैव तु दूर्वया” अर्थात गणेशजी की तुलसी पत्र से और दुर्गा की दूर्वा से पूजा न करें | 

संकट नाशक गणेश स्त्रोतम से मानव की सभी समस्याओं का समाधान होता है | प्रतिदिन प्रातः स्नानादि से निर्वृत्त होकर भगवान गणेशजी की यथाशक्ति पूजन करने के बाद इस स्त्रोत का पाठ करना चाहिए | नियमित पाठ करने से आपकी समस्यों का समाधान होने लगेगा |

संकट नाशक गणेश स्त्रोतम

sankat nashan ganesh stotram

नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायु:कामार्थसिद्धये ।।१ ।।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।।
तृतीयं कृष्णपिङ्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ।।२ ।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ।।३ ।।

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ।।४ ।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर: ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ।।५ ।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।६ ।।

जपेत् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।७ ।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ।।८ ।।

|| इति श्री नारदपुराणे संकट नाशक गणेश स्त्रोतम संपूर्णम् ||

पाठ विधि (sankat nashan ganesh stotram)

इस संकट नाशक गणेश स्त्रोत का पाठ किसी भी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ करना चाहिए | गणेशजी की मूर्ति या फोटो को किसी लकड़ी के पाटे पर स्वेत वस्त्र बिछाकर उस पर गणेशजी की स्थापना करनी चाहिये | तत्पश्चात किसी ब्रम्हाण के द्वारा या स्वयं भगवान की श्रद्धा पूर्वक पूजन आराधना करनी चाहिए | पूजनोपरांत हाँथ में जल लेकर संकल्प करना चाहिए | और उसके बाद संकट नाशक भगवान गणेशजी का इस स्त्रोत का पाठ करना चाहिये |

इस पाठ के करने से 14 दिन से ही लाभ समझ में आने लगेगा | इसका प्रयोग 1 वर्ष का होता है | यदि कोई व्यक्ति नियमित 1 वर्ष तक इस पाठ को करता है तो यह सिद्ध हो जाता है | 1 वर्ष तक करने के बाद व्यक्ति के जीवन में परेशानियों का अंत सा हो जाता है | और यदि कभी कोई समस्या आती भी है तो भगवान गणेश के नाम स्मरण मात्र से समस्या का समाधान हो जाता है |

वैसे तो भगवान गणेश जी के अनेक छोटे-छोटे प्रयोग बताये गए हैं |

अपने मुख्य द्वार पर गणेश जी की मूर्ति या फोटो लगानी चाहिए | ध्यान रखियेगा गणेश जी की दृष्टि अन्दर की ओर होनी चाहिए | अर्थात मूर्ति या फोटो द्वार पर इस तरह लगायें की उनका मुख अन्दर की तरफ होना चाहिए | कहते हैं कि जहां पर भगवान गणेश जी की दृष्टि होती है वहां पर ऋद्धि-सिद्धि का वास होता है | और उनके पीठ की तरफ दरिद्रता रहती है |

स्वेतार्क गणेश जी

सफ़ेद आक (मदार) का कोई पुराना वृक्ष देखिये | किसी शुक्लपक्ष की तृतीया की शाम को एक लोटे में जल, एक दिया, एक सिक्का और haldi से पीले किये हुए चावल लेकर वृक्ष के पास जाकर पहले जल चढ़ाइए | उसके बाद दीपक जलाइए फिर सिक्का रखकर उस पर पीले चावल रखकर निमत्रण देकर बापिस आ जाइए | दुसरे दिन प्रातः वृक्ष के पास जाकर निवेदन करिए कि हम आपको लेने आये है आप हमारे साथ चलकर हमारा कल्याण कीजिये |

तत्पश्चात पूर्व दिशा की ओर की जड़ खोदिये | कभी-कभी उस जड़ में गणेशजी की आकृति बनी मिल जाती है और यदि बनी न हो तो किसी से हलकी आकृति बनवा लेनी चाहिए | उसके बाद उस मूर्ति की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए या किसी ब्रम्हाण से करवानी चाहिए | इस स्वेतार्क गणेशजी की पूजा से धन में कभी धन का आभाव नहीं होता और न ही कभी कोई बड़ा संकट आ सकता है |   

आटे के दीपक (sankat nashan ganesh stotram)

किसी भी कार्य का शुभारम्भ करने से पहले यह कार्य अवश्य करना चाहिए | उदहारण के लिए आपके परिवार में किसी का विवाह संपन्न होना है | जिस दिन विवाह की शुरुआत होती है उसी दिन आटे के ग्यारह दीपक बनाकर एक थाली में रखकर जलाएं | दीपक जलाकर गणेश जी के सम्मुख रखकर प्रार्थना करनी है | हे प्रभो हम जो कार्य करने जा रहे हैं उसे निर्विघ्न संपन्न करें | तत्पश्चात दुसरे दिन से एक दिया मिटटी का ले सकते हैं, प्रतिदिन गणेशजी के नाम से जलाया करें | जब तक आपक कार्य संपन्न नहीं हो जाता प्रतिदिन एक दिया जलना है | आपके किसी कार्य में कोई विघ्न नहीं आ सकता | प्रथम दिन जो आटे के दीपक जलाये थे उनको उसी दिन या दूसरे दिन ठन्डे हो जाने पर उन दीयों को इकठ्ठा कर या तो किसी नदी या तालाब में डालें जहां मछलियाँ खा लें या उस आटे की रोटी बनाकर किसी गाय को खिलाएं | यह अनुभूत प्रयोग है आप इसे अजमाकर देख सकते हैं |  

इस प्रकार गणेश जी के अनेक प्रयोग हैं | गणेश जी मोदक बहुत प्रिय है, मोदक का भोग अवश्य लगाया करें | गणेश जी विद्द्या, बुद्धि, धन, यश, वैभव संसार की सभी सुख देने में सक्षम हैं | गणेशजी की आराधना देवता, ऋषि मुनि आदि सभी करते आये हैं | इसलिए हमें भी करनी चाहिए |

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