tantra mantra sadhana

मन्त्र साधना कैसे करें –

(tantra mantra sadhana) – यन्त्र, तन्त्र, मन्त्र साधना का नाम सुनते ही आदमी के मन में कुछ सीखने का या कुछ करने का विचार आ जाता है | कुछ लोग तो किसी भी किताब से पढ़कर साधना भी आरम्भ कर देते हैं | कुछ दिन करते हैं तत्पश्चात मन्त्र साधना में कुछ नहीं है ऐसा बोलकर उसे छोड़ देते हैं सही भी है किताब से पढ़कर यदि साधना में सिद्धि मिल जाए तो दुनिया में सभी साधक हो जायेंगे | किन्तु बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं है | किसी भी प्रकार साधना करने से पहले योग्य गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है | तभी साधना में सफलता मिलेगी |

tantra mantra sadhana
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साधना किसे कहते हैं ? (tantra mantra sadhana

अपनी कामना या अभीष्ट की सिद्धि के प्रमुखतम उपाय को साधना कहते हैं | यह एक क्रियात्मक विज्ञान है जो साधक को साध्य से मिलाकर उसकी समस्त कामनाओं को परिपूर्ण कर देता है | प्रत्येक व्यक्ति को जो भी प्राप्त होता है वह केवल साधना के फलस्वरूप ही प्राप्त होता है | अतः साधना सफलता की कुंजी है |

भारत जैसे साधना प्रधान देश में दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से छुटकारा पाने से लिए सुदूरतम प्राचीनकाल से मन्त्र साधना का आश्रय लिया जाता रहा है | इस साधना के द्वारा न केवल हमारी लौकिक कामनाओं की पूर्ति या लौकिक सिद्धियाँ ही मिलतीं है अपितु इस साधना के द्वारा दुखों से मुक्ति भी मिलती है |

मन्त्र, यन्त्र एवं तंत्र वास्तव में क्या हैं ?

मन्त्र, यन्त्र एवं तंत्र तात्विक रूप से भिन्न वास्तु नहीं हैं वल्कि एक ही सत्य के तीन प्रकार हैं | या यों कहें कि एक शक्ति के तीन रूप हैं | व्यक्ति को शक्ति को उदीप्त कर उसमें गुरुत्तर शक्ति का संचार करने वाला गूढ़ रहस्य मन्त्र कहलाता है | मन्त्र का चित्रात्मक रूप यन्त्र कहलाता है | तथा क्रियात्मक रूप यन्त्र कहलाता है | मन्त्र के इन त्रिविध रूपों का क्रियात्मक विज्ञान मन्त्र साधना कहलाता है | इष्ट सिद्धि या अभीष्ट कामना की पूर्ति इसी क्रियात्मक विज्ञान पर निर्भर रहती है | इसीलिए मन्त्र साधना की छोटी से छोटी से प्रक्रिया में जरा सी भी भूल-चुक हो जाने पर मात्र असफलता ही नहीं मिलती वल्कि मानते साधक कभी-कभी संकटों में फस जाता है | इस प्रकार की भूल चूकों से बचने के लिए साधक को गुरु का आश्रय लेना चाहिए |

साधना शब्द का अर्थ अत्यंत व्यापक है | कोई भी कार्य हो उसी का एक साधन तथा एक साधना होती है आगम ग्रंथों के अनुसार वे सब पदार्थ जो सिद्धि के अनुकूल होते हैं साधन कहलाते हैं तथा उन पार्ट आचरण करना ही साधना है |

मन्त्र साधना के कितने रूप माने गए हैं ?  

मन्त्र साधना के मुख्य रूप से तीन प्रकार के आचार माने गए हैं | 1 – दक्षिणाचार 2- वामाचार 3- दिव्यचार | साधक को अपने गुरु की आज्ञानुसार आचार का निर्धारण करना चाहिए तथा गुरु को शिष्य की प्रकृति, अभिरुचि एवं शक्ति का विचार कर काम्य एवं निष्काम उपासना के भेद पर ध्यान देकर आचार का उपदेश देना चाहिए |

मन्त्र साधना शब्द मात्र नहीं है | वह इष्ट देव से अभिन्न होते हुए भी उसके स्वरूप का बोध कराता है | मन्त्र जिस अर्थ या लक्ष्य का संकेत करता है साधक को उसकी जानकारी होनीं चाहिए इससे साधक लक्ष्य भ्रष्ट नहीं होता | अर्थपूर्ण मन्त्र के जप के प्रभाव से ही सिद्धि होती है |

मन्त्र, यन्त्र, तंत्र में गुरु की आवश्यकता –

यदि समस्त साधको का अधिकार एक होता साधनाएं अनेक न होतीं तथा सिद्धि के स्टार भी अनेक न हो तो यह संभव था कि बिना दीक्षा के ही सिद्धि मिल जाती परन्तु ऐसा नहीं है | गुरु की कृपा एवं शिष्य की श्रद्धा इन दो पवित्र भावनाओं का संगम दीक्षा है | दीक्षा से शरीर की समस्त अशुद्धियाँ मन की समस्त भ्रांतियां मिट जाती हैं और सिद्धि का मार्ग खुल जाता है | अतः जो साधक गुरु से दीक्षा प्राप्त कर उनके आदेशानुसार मन्त्र साधना में प्रवृत्त होता है उसे अवश्य ही सिद्धि प्राप्त होती है |

साधना के लिए कोनसी दीक्षा लेनी चाहिए?

साधना के लिए मान्त्रि दीक्षा लेनी चाहिए | यह दीक्षा मन्त्र, पूजा, आसन, न्यास एवं ध्यान द्वारा होती है | इसमे गुरुदेव शिष्य को मंत्रोपदेश करते हैं | वाही मन्त्र साधक को शीघ्र सिद्धि देने वाले होते हैं | मन्त्र प्राप्त करने के बाद सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुरश्चरण करते हैं | पुरश्चरण के द्वारा ही साधक को सिद्धि मिलती है | पुरश्चरण द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर उस मन्त्र के द्वारा विविध कामनाओं की पूर्ति हेतु किये जाने वाले प्रयोगों को अनुष्ठान कहते हैं | कामना पूर्ति के लिए अनुष्ठान भी उतना ही जरुरी है जितना सिद्धि के लिए पुरश्चरण | 

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