Teej kab hai हरितालिकाव्रत कथा (तीज)

सुहागिनों के अखण्ड सौभाग्य का रक्षक हरितालिकाव्रत (तीज)

Teej kab hai – वैसे हिन्दू धर्मानुसार उदया तिथि को माना जाता है, परन्तु 2 सिंतंबर को गणेश स्थापना का मुहूर्त है | इसलिए तीज 1 सितम्बर को मनाया जायेगा यही विद्वानों का मत है |

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यह व्रत पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखण्ड आदि प्रांतों में भद्रपद शुक्ल तृतीया को सौभाग्यती स्त्रियाँ अपने अखण्ड सौभाग्य की रक्षा के लिये बडी श्रद्धा विश्वास और लगन के साथ हरतालिकाव्रत (तीज) का उत्सव मनाती हैं। जिस त्याग तपस्या और निष्ठा के साथ स्त्रियाँ यह व्रत रखतीं हैं, वह बडा ही कठिन है। इसमें फलाहार सेवन की बात तो दूर रही निष्ठा वालीं स्त्रियाँ जल तक ग्रहण नहीं करतीं। व्रत के दूसरे दिन प्रातः काल स्नान के पश्चात व्रत परायण स्त्रियाँ सौभाग्य द्रव्य एवं वायन छूकर ब्राम्हणों को देतीं हैं। इसके बाद जल आदि पीकर पारण करतीं हैं। इस व्रतमें मुख्यरूप से शिव- पार्वती तथा गणेशजी का पूजन किया जाता है।

इस व्रत को सर्व प्रथम गिरिजानंदिनी उमा ने किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुये थे। इस व्रत के दिन स्त्रियाँ वह कथा भी सुनतीं हैं जो पार्वतीजी के जीवन में घटित हुई थी। उसमें पार्वती के त्याग, संयम, धैर्य तथा एकनिष्ट पतिव्रत धर्मपर प्रकाश डाला गया है, जिससे सुनने वाली स्त्रियों का मनोबल ऊंचा उठता है।

हरतालिका व्रत कथा ( Teej kab hai )

कहते हैं, दक्षकन्या सती जब पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहन कर यागाग्नि में दग्ध हो गयीं, तब वे ही मैना और हिमवान की तपस्या के फलस्वरूप उनकी पुत्री के रूप में पार्वती के नाम से पुनः प्रकट हुईं। इस नूतन जन्म में भी उनकी पूर्व की स्मृति बनी रही और वे नित्य निरंतर भगवान शिव के ही चरणारविंदों के चिंत्न में संलग्न रहने लगीं। जब वे कुछ वयस्क हो गयीं तब मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिये पिता की आज्ञा से तपस्या करने लगीं। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर बडी कथोर साधना की। जब उनकी तपस्या फलोन्मुख हुई तब एक दिन देवर्षि नारद जी महाराज गिरिराज हिमवान के यहाँ पधारे। हिमवान ने अहोभाग्य माना और देवर्षि की बडी श्रद्धा के साथ सपर्या की।

कुशल क्षेमके पश्चात नारद जी ने कहा – भगवान विष्णु आपकी कन्या का वरण करना चाहते हैं उन्होंने मेरे द्वरा यह संदेश कहलवाया है। इस सम्बंध में आपका जो विचार हो उससे मुझे अवगत करायें। नारद जी ने अपनी ओर से भी इस प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिय। हिमवान राजी हो गये। उन्होंने स्वीकृति दे दी। देवर्षि नारद पार्वतीके पास जाकर बोले – उमे छोडो यह तपस्या, तुम्हें अपनी साधना का फल मिल गया। तुम्हारे पिता ने भगवान विष्णु के साथ तुम्हारा विवाह पक्का कर दिया है।

इतना कहकर नारदजी चले गये। उनकी बात पर विचार करके पार्वतीजी के मन में बडा कष्ट हुआ। वे मूर्छित होकर गिर पडीं। सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने उनसे अपना शिवविषयक अनुराग सूचित किया।

सखियाँ बोलीं –

तुम्हारे पिता तुम्हें लिवा जाने के लिये आते ही होंगें। जल्दी चलो, हम किसी दूसरे गहन वन में जाकर छिप जायँ।

एसा ही हुआ। उस वन में एक पर्वतीय कंदरा के भीतर पार्वती शिवलिंग बनाकर उपासना पूर्वक उसकी अर्चना आरम्भ की। उससे सदाशिव का आसन डोल गया। वे रीझकर पार्वती के समक्ष प्रकट हुए और उन्हें पत्नि रूप में वरण करने का वचन देकर अंतर्ध्यान हो गये। तत्पश्चात अपनी पुत्री का अन्वेषण करते हुए हिमवान भी वहाँ आ पहुँचे और सब बातें जानकर उन्होंने पार्वती का विवाह भगवान शंकर के साथ ही कर दिया।

अन्ततः ‘बरउँ शम्भु न त रहउँ कुआरी॥‘ पार्वती के इस अविचल अनुराग की विजय हुई। देवी पार्वती ने भाद्र शुक्ल तृतीया हस्त नक्षत्र में आराधना की थी इसलिये इस तिथि को यह व्रत किया जाता है।

तभी से भाद्रपद शुक्ल तीज को स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिये तथा कुमारी कन्याऐं अपने मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिये हरितालिका (तीज) का व्रत करतीं चलीं आ रहीं हैं।

आलिभिर्हरिता यस्मात तस्मात सा हरितालिका” सखियों के द्वारा हरी गयी – इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्रत का नाम हरितालिका हुआ। इस व्रत के अनुष्ठान से नारीको अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

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