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व्रतों के भेद

पिछले लेख में vrat उपवास,  व्रतों के भेद, vrat का अर्थ आदि के बारे में  संक्षिप्त में जाना इस लेख में व्रतों के कुछ भेद और हैं जिनके बारे में हम विस्तार से जानेंगे |

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व्रतों के भेद

व्रत कितने प्रकार के होते हैं ? – 1 –  दिव्यपर्व  2 – देवपर्व  3 – पितृपर्व  4 – कालपर्व  5 – जयन्तीपर्व  6 – प्राणिपर्व  7 – वनस्पतिपर्व  8 – मानवपर्व  9 – तीर्थपर्व आज जानाते हैं उपर्युक्त 9 पर्वों के बारे में |

1 –  दिव्यपर्व – (vrat)

ये पर्व ग्रह-नक्षत्रों के योग से होते हैं – कुछ पर्व तिथि, नक्षत्र, दिन, ग्रहयोग के कारण मनाये जाते हैं जिन्हे ”दिव्यपर्व” कहते हैं | संक्राति, कुम्भ, वारुणी, ग्रहण आदि दिव्यपर्व हैं | ये विशेष ग्रह-नक्षत्रों के योग के समय होते हैं |

कुम्भ तथा वारुणी पर्व – (vrat)

– कुम्भपर्व सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति के विशेष संयोग पर आता है | प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन ओर नासिक में – ये पर्व प्रति बारह वर्ष पर पड़ते हैं | और इसी प्रकार वारुणी पर्व भी वरुण तथा दूसरे ग्रह-नक्षत्रों के योग से होता है |

ग्रहण – – दिव्यपर्वों में ग्रहण का भी विशेष स्थान है | ग्रहण के समय भोजन आदि करने से रोग होते हैं | इसलिए आहार आदि अनेक कार्य वर्जित हैं |इसीलिए ग्रहण के दिन vrat किया जाता है |

पुरुषोत्तम मास

-हर तीन वर्ष के पश्चात एक चान्द्रमास बढ़ जाता है, जिसे ” पुरुषोत्तममास ” कहते हैं | यह पूरा महीना ही पर्व होता है | पुरे महीने में संयम एवं उपासना का महत्त्व सामान्य समय से अधिक है | इस अधिक मास में स्नान, ध्यान, जप, कीर्तन, भजन, कथाश्रवण और vrat आदि का विशेष महत्त्व है | शास्त्रों के अनुसार इसका विशेष पुण्य है |और काशी की पंचकोशी परिक्रमा पुरुषोत्तममास में विशेष रूप से होती है | 

2 – देवपर्व

ये देवताओं के पर्व माने जाते हैं – दिव्य पर्वों के पश्चात देवपर्वों का स्थान है | हमारा एक वर्ष देवताओं का एक दिन रात्रि होता है | दक्षिणायन के महीने देवताओं का रात्रिकाल है और उत्तरायण के महीने देवताओं का दिन माना गया है | इसलिए महत्वपूर्ण मंगल कार्य उत्तरायण में होते हैं | इसी प्रकार एक महीने के दोनों पक्षों में शुकलपक्ष देवताओं का कार्यकाल है और कृष्णपक्ष उनका विश्रान्तिकाल है | कुछ तिथियां देवपर्व हैं जैसे – गणेशचतुर्थी, एकादशी, प्रदोष आदि तिथियां देवताओं के विशेष पर्व हैं | गणेशजी  का पर्व चतुर्थी, भगवान विष्णु का पर्व एकादशी तथा इसी प्रकार भूतभावन भगवान शंकर का पर्व प्रदोष है | इस प्रकार देवताओं के विभिन्न पर्व हैं उन पर्वों का अचार, विधान, संयम तथा पूजा vrat आदि उस देव शक्ति के अनुरूप होते हैं, जिसका वह पर्व है |

3 – पितृपर्व

– अश्वनीमास का कृष्णपक्ष पूरा पितृपक्ष है | यह मास पितरों के लिए दिन में मध्याह्नकाल तक भोजनकाल है | इस समय उन्हें पिण्ड का स्मरण होता है | इसके अतिरिक्त जिस दिन उनका शरीरान्त हुआ हो वह दिन भी उन्हें स्मरण होता है | यह समय पितृ श्राद्ध का है | इसके अतिरिक्त अमावस्या  एवं संक्राति के अवसर पर तथा विशेष तीर्थो में जाने पर प्रतिश्राद्ध का विधान है | उन तीर्थों तथा समयों में दिए गए पिण्ड से तथा ब्राम्हण भोजन दान आदि से पितरों की तृप्ति सहज होती है | क्योंकि भाव ग्रहण के लिए उस समय वे संपर्क में होते हैं |

4 – कालपर्व

तिथि, ऋतू , माह आदि का प्रारंभ समय – जिस दिन सृष्टि की रचना हुई थी वह तिथि पर्व है | इसी प्रकार युगों की तिथियां भी पर्व हैं | वर्ष की प्रथम तिथि तो विश्व के सभी देशों और जातियें में पर्व मानी ही जाती है | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी सम्वत्सर की आरम्भ तिथि है जो भारतीय तिथि गणना में मुख्य रूप से मान्य है | अतः काल सम्बन्धी पर्व भी संक्रमण काल के दिव्यपर्वों की भांति ही हैं |

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (gudi padwa) से नवमी तक का महत्त्व

5 – जयंती पर्व 

भगवान तथा महापुरुषों का जन्म्पोत्सव – भारतीय संस्कृति में नश्वर रुपकी तथा देश या जाती के भौतिक उत्कर्ष की कोई महत्ता नहीं है | जयंतियां मनाई जातीं हैं भगवान के अवतारों की या उन महापुरुषों की जिनका स्मरण भगवानकी स्मृति को जाग्रत करता है | भगवत्सांनिध्यप्राप्त महा-पुरुषों की तथा भगवान के अवतारों के अतिरिक्त दूसरे किसी की जयंती मनाना शरीर को महत्त्व देना है या भोगवृत्ति को प्रोत्साहित करना है | इसलिए भारत में रामनवमीं, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नृसिंहचतुर्दशी, वमनद्वादशी, हनुमानजयंती, गणेशचतुर्थी, परशुरामजयंति,आदि पावन पर्व मनाये जाते हैं | जिसमे परमात्म प्रभु का स्मरण होता है तथा व्यक्ति अंतरमुख होने की दिशा में अग्रसर होता है |

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6 – प्राणिपर्व

नाग, गाय आदि की पूजन की तिथि –  हिन्दुधर्म में प्रत्येक पदार्थ तथा प्राणी के अधिष्ठातृ देवता मने जाते हैं | विश्व में जिन्हे हम साधारण प्राणी मानते हैं उनमें भी कुछ दिव्य प्राणी हैं | नाग और गौ – ये दिव्य प्राणियों में हैं | जैसे – ग्राम के अधिष्ठातृ देवता की पूजा होती है वैसे ही ग्राम नाग की पूजा भी विशेष अवसरों पर होती है तथा इनकी पूजा के पर्व भी होते हैं | नागपञ्चमी नागदेवता की पूजा का मुख्य पर्व है |

इसी प्रकार गोमाता सर्वदेवमयी है | हिन्दुओं के सभी देवी-देवताओं का निवास गौ में है | शास्त्र गाय की महिमा से भरे पड़े हैं | निष्ठापूर्वक गौमाता की सेवा की जाय तो अभीष्ट फल प्राप्त करना कोई कठिन बात नहीं है | शास्त्र के अनुसार प्रत्येक हिन्दू गृहस्थ के घर में गोसेवा होनी चाहिए, नित्य गोपूजन होना ही चाहिए | भोजन से पूर्व गोग्रास देना तो भारतवासियों का नित्य कर्म है | गौमाता की पूजा का मुख्य पर्व गोपाष्टमी है जो आनंदकंद ब्रम्हाण्डनायक भगवान श्री कृष्ण के गोचारण का प्रथम दिन है | मदनमोहन श्री श्याम सुन्दर ने इसी दिन गौपूजन किया था अतः भारतवासी भी गोपाष्टमी पर्व पर समारोहपूर्वक गौपूजन करते हैं |

7 – वनस्पति पर्व

जिस तिथि में वृक्षों की पूजा तथा उनके अधिष्ठित देवता का व्रत किया जाता है – जैसे प्राणियों के अधिष्ठित देवता होते हैं वैसे ही वनस्पतियों के भी अधिष्ठित देवता होते हैं | कुछ दिव्य वनस्पतियां हैं जिनके प्रत्यक्ष पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है | भौतिक दृष्टि से इन वनस्पतियों के प्रत्यक्ष लाभ भी मनुष्य को प्राप्त होते हैं | जैसे – अश्वत्थ (पीपल )- वृक्ष, तुलसी का पौधा, वटबृक्ष तथा निम्ब (नीम )वृक्ष, कदली (केला )वृक्ष, बिल्व (बेल )वृक्ष, आवला वृक्ष आदि पूजने का विधान है |

इन वृक्षों के अलग-अलग अधिष्ठित देवता हैं तथा कुछ वृक्षों के पूजन के निर्धारित दिन हैं जो पर्वरूप में माने  जाते हैं | जैसे पीपल की पूजा विशेष रूप से शनिवार को करने का विधान है, तुलसी की पूजा यद्द्पि प्रतिदिन करनी चाहिए, परन्तु कार्तिकमास में तथा वैकुण्ठ चतुर्दशी आदि तिथियों पर इसका विशेष महत्त्व माना गया है | देवोथापनी एकादशी के दिन तो तुलसी के साथ भगवान का विवाह  भी कराया जाता है |

वटवृक्ष के पूजन का विधान

अमावस्या को वटवृक्ष के पूजन का विधान है | केले का पूजन विशेष रूप से बृहस्पतिवार को करने का विधान है | इसी प्रकार विल्व वृक्ष का पूजन सोमवार को होता है |  इन वनस्पतियों के पत्र और फल भी भगवान की पूजा में प्रयुक्त होते हैं | विल्वपत्र तथा विल्व फल भूतभावन सदाशिव की पूजा में चढ़ाये जाते हैं | तुलसी पत्र भगवान विष्णु (शालग्राम ) की पूजा में चढ़ाना अनिवार्य है | शीतलाष्टमी पर शीतला माता के साथ निम्ब वृक्ष की पूजा होती है | इसी  प्रकार कार्तिक मास में अक्षयनवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजन की बड़ी महिमा है | इस दिन  इस वृक्ष के निचे बैठकर इसकी जड़ में दूध से पितरों का तरपन करना चाहिए तथा वृक्ष के निचे बैठकर ही ब्राम्हण भोजन, दान तथा स्वयं भोजन का शास्त्रों में विशेष पुण्य बताया है |

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8 – मानव पर्व

यज्ञ, कथा, सत्संग आदि – मानव पर्व तीन प्रकार के होते हैं | एक ऐसे पर्व जो सामाजिक रूप से मनाये जाते हैं | जैसे कोई यज्ञ, कथा, सत्संग आदि | कृषि, उद्द्योग तथा व्यापर आदि में भी देवपूजन का विशेष महत्त्व माना गया है | समष्टि रूप से भी इनके पर्व मनाये जाते हैं जैसे – विश्वकर्मा पूजा, नवानेष्टि यज्ञ, वसंतपंचमी पर सरस्वती पूजन, दीपावली पर लक्ष्मी पूजन आदि |

दूसरे प्रकार के पर्व व्यक्ति के जीवन से सम्बंधित होते हैं | जैसे – पुत्रजन्मोत्सव, विवाहमहोत्सव, नवीन गृह का गृहप्रवेश ये सब व्यक्ति के पर्व हैं | इनमें भी जप, vrat, हवन, पितरों एवं देवताओं का अर्चन, ब्राम्हणों का पूजन तथा दान, प्रतिगोष्ठी आदि उत्सव किये जाते हैं |

तीसरे प्रकार के पर्व हैं किसी विशेष उद्देश्य से किये गए पूजन तथा समारोह | ऐसे पर्वों का कोई समय निश्चित नहीं रहता | हमारी श्रद्धा – भक्तिभावना ही इन उत्सवों का कारण  होती है | जैसे – भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ, यज्ञसत्र, पुराणसत्र, कथा-कीर्तन, पूजन-सत्संग आदि इन पर्वों के मुख्य अंग हैं |

9 – तीर्थ पर्व

जहां भगवान के अवतार हुए और दिव्य धामों का भी प्राकट्य हुआ – विश्व में जितने प्रकार के प्राणी हैं, उनमें मनुष्यों की संख्या बहुत थोड़ी है | चूँकि मनुष्य योनि ही कर्मयोनि है और इसी मानव योनि में जन्म लेकर ही जिव भगवद्धाम अथवा भगवान को प्राप्त कर सकता है | इसी प्रकार की बात स्थान के विषय में भी है | पृथ्वी पर जीतनी भूमि है उनमे पुण्य भूमि बहुत कम है | अपने शास्त्र भारत वर्ष को पुण्य भूमि मानते हैं |

– गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे |
( विष्णु० 2| ३| २४)

अर्थात स्वर्ग में देवता लोग यह गीत गाते हैं कि वे व्यक्ति धन्य हैं जिन्होंने भारतभूमि में जन्म लिया क्योंकि यह भारतभूमि केवल भोगभूमि नहीं कर्मभूमि भी है | इसी पुण्य भूमि पर भगवान अवतार लेते हैं | प्रभु के अवतार के समय उनके दिव्य धामों का प्राकट्य भी इस पृथ्वी पर हो जाता है | भारत में भगवान का जहाँ – जहाँ प्राकट्य हुआ या जहां – जहां भगवान के अवतार हुए वहां – वहां दिव्य धामों का भी प्राकट्य हुआ अर्थात वह भूमि दिव्य हो गई | ये स्थान हमारे तीर्थ स्थल बन गए |  

तीर्थों के मुख्य देवता भी होते हैं | उन तीर्थों के अनुरूप कृत्य होते हैं |जैसे – गया पितृलोक से सम्बंधित तीर्थ है वहां दिए पिण्ड पितरों को अक्षय तृप्ति देते हैं | इसके अतिरिक्त कुछ तीर्थों के कुछ विशेष पर्वकाल हैं जैसे – प्रयाग में माघमास | इन समयों में इन तीर्थों का अपने नित्य दिव्य धामों से अधिक निकट संपर्क हो जाता है और ग्रह योग के प्रभाव भी वहां अनुकूल रहते हैं |

 पर्वों का श्रेणी विभाग

–  पर्वों में होने वाले कार्यों के अनुसार भी कुछ विभाग किये जा सकते हैं | कुछ पर्व उपासना प्रधान होते हैं, कुछ vrat प्रधान, कुछ यज्ञप्रधान, कुछ स्नानप्रधान, कुछ अनुष्ठानप्रधान, और कुछ महोत्सवप्रधान पर्व हैं |
इस लेख में vrat के कुछ और भेदों के बारे में विस्तार से जाना अगले लेख में vrat पालन के कुछ उदहारण देखेंगे जैसे किस ने कौन vrat धारण किया और हमें उस vrat से क्या शिक्षा मिली या हमें किस व्रत का अनुसरण करना चाहिए |

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