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पद्मिनी एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व

पद्मिनी एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व

✍️ Pandit Rajkumar Dubey  |  🕒 20 Jul 2023  |  📂 ज्योतिष  |  ⏱ 5 मिनट पढ़ें

पद्मिनी एकादशी व्रत विधि एवं कथा

Padmini Ekadashi vrat katha – यह एकादशी अधिक मास के शुक्लपक्ष में आती है। इसको पुरुषोत्तम मास, मलमास तथा अधिक मास के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी को अधिक मास एकादशी भी कहते हैं।

पारण के नियम

पारण के बारे में ऐसी मान्यता है कि द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले पारण करना चाहिए। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाये तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी के रहते हुए पारण न करना पाप करने के समान होता है। द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि में व्रत का पारण नहीं करना चाहिए। मध्यान्ह के दौरान भी पारण करने से बचाना चाहिए। यदि किसी कारणवश प्रातः काल पारण न कर पायें तो मध्यान्ह के बाद पारण करना चाहिए। कभी-कभी एकादशी तिथि दो दिन की होती है ऐसी स्थिति में संभव हो तो दोनों दिन व्रत करना चाहिए। दो दिन व्रत करने की सामर्थ्य न हो तो दूजी एकादशी का व्रत करना चाहिए।

यह पद्मिनी एकादशी भारत में हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है और ऐसा माना जाता है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से अपार कृपा मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पद्मिनी एकादशी व्रत की कथा

इस पद्मिनी एकादशी से जुड़ी कहानी हरिश्चंद्र नाम के एक राजा की है। राजा हरिश्चंद्र अपनी धार्मिकता और सत्य के पालन के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने राज्य पर बड़ी निष्ठा के साथ शासन किया और अपनी प्रजा से प्यार करते थे। हालाँकि, उनके गुणों का परीक्षण तब हुआ जब उन्हें कई चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

एक दिन, विश्वामित्र नाम के एक ऋषि राजा हरिश्चंद्र के दरबार में पहुंचे और उनसे पर्याप्त दान के लिए अनुरोध किया। राजा ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद स्वेच्छा से अपना पूरा राज्य और अपनी सारी संपत्ति ऋषि को अर्पित कर दी। वह दरिद्र हो गए लेकिन अपनी सत्यता के प्रति समर्पित रहे।

अब, भाग्य के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र को एक और परीक्षा का सामना करना पड़ा। उनका बेटा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और उसे तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता थी। राजा के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे, तो उनकी पत्नी, रानी तारामती ने उनसे अपने बेटे की जान बचाने के लिए विनती की—हे महाराज! पुत्र के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जो कुछ भी करना पड़े, कीजिए।

रानी की विनती सुनकर, राजा हरिश्चंद्र ने अपने बेटे के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए एक श्मशान भूमि में नौकर के रूप में काम करने का फैसला किया। उन्होंने एक केयरटेकर (देख-भाल करने वाला) की नौकरी की और मृतकों के शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए कर (फीस) जमा करना शुरू कर दिया।

रानी तारामती की भक्ति और व्रत

इस समय के दौरान, राजा की पत्नी तारामती ने अपने पति की सलामती और अपने बेटे के जल्दी ठीक होने की प्रार्थना करते हुए, अत्यंत भक्ति-भाव के साथ पद्मिनी एकादशी व्रत का पालन करने का फैसला किया। उसने पूरे दिन उपवास किया और रात भर भगवान विष्णुजी की पूजा की।

रानी तारामती की अटूट आस्था और समर्पण से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें अपने पति के खोए हुए राज्य, धन और उनके पुत्र के अच्छे स्वास्थ्य की बहाली का आशीर्वाद दिया। तारामती की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राजा हरिश्चंद्र को भी मोक्ष प्रदान किया।

इस प्रकार, पद्मिनी एकादशी राजा हरिश्चंद्र और उनकी पत्नी रानी तारामती की कहानी से जुड़ी हुई है, जो सत्य, भक्ति की शक्ति और एकादशी व्रत रखने के प्रभाव को दर्शाती है।

व्रत का महत्व

भक्तों का मानना है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने और धार्मिक अनुष्ठान करने से वे भगवान विष्णुजी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, आध्यात्मिक विकास प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं। यह क्षमा मांगने, दान के कार्य करने और परमात्मा के साथ अपने आध्यात्मिक संबंध को गहरा करने के लिए एक शुभ दिन माना जाता है।

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