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व्रत के भेद

व्रत के भेद

✍️ Pandit Rajkumar Dubey  |  🕒 19 Jul 2026  |  📂 व्रत एवं त्योहार  |  ⏱ 13 मिनट पढ़ें

पिछले लेख में हमने vrat उपवास, व्रतों के भेद, vrat का अर्थ आदि के बारे में संक्षिप्त में जाना। इस लेख में व्रतों के कुछ भेद और हैं जिनके बारे में हम विस्तार से जानेंगे।

व्रतों के भेद – व्रत कितने प्रकार के होते हैं? शास्त्रों के अनुसार मुख्य रूप से व्रतों और पर्वों के 9 भेद माने गए हैं: 1 – दिव्यपर्व, 2 – देवपर्व, 3 – पितृपर्व, 4 – कालपर्व, 5 – जयन्तीपर्व, 6 – प्राणिपर्व, 7 – वनस्पतिपर्व, 8 – मानवपर्व, 9 – तीर्थपर्व। आइए आज विस्तार से जानते हैं उपर्युक्त 9 पर्वों के बारे में।

1 – दिव्यपर्व

ये पर्व ग्रह-नक्षत्रों के योग से होते हैं – कुछ पर्व तिथि, नक्षत्र, दिन, ग्रहयोग के कारण मनाये जाते हैं जिन्हें 'दिव्यपर्व' कहते हैं। संक्रांति, कुम्भ, वारुणी, ग्रहण आदि दिव्यपर्व हैं। ये विशेष ग्रह-नक्षत्रों के योग के समय होते हैं।

कुम्भ तथा वारुणी पर्व – (vrat): कुम्भपर्व सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति के विशेष संयोग पर आता है। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में – ये पर्व प्रति बारह वर्ष पर पड़ते हैं। और इसी प्रकार वारुणी पर्व भी वरुण तथा दूसरे ग्रह-नक्षत्रों के योग से होता है।

ग्रहण: दिव्यपर्वों में ग्रहण का भी विशेष स्थान है। ग्रहण के समय भोजन आदि करने से रोग होते हैं, इसलिए आहार आदि अनेक कार्य वर्जित हैं। इसी कारण ग्रहण के दिन vrat किया जाता है।

पुरुषोत्तम मास: हर तीन वर्ष के पश्चात एक चान्द्रमास बढ़ जाता है, जिसे "पुरुषोत्तममास" या अधिकमास कहते हैं। यह पूरा महीना ही पर्व होता है। पूरे महीने में संयम एवं उपासना का महत्त्व सामान्य समय से अधिक है। इस अधिक मास में स्नान, ध्यान, जप, कीर्तन, भजन, कथाश्रवण और vrat आदि का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों के अनुसार इसका विशेष पुण्य है और काशी की पंचकोशी परिक्रमा पुरुषोत्तममास में विशेष रूप से होती है।

2 – देवपर्व

ये देवताओं के पर्व माने जाते हैं – दिव्य पर्वों के पश्चात देवपर्वों का स्थान है। हमारा एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है। दक्षिणायन के महीने देवताओं का रात्रिकाल है और उत्तरायण के महीने देवताओं का दिन माना गया है। इसलिए महत्वपूर्ण मंगल कार्य उत्तरायण में होते हैं।

इसी प्रकार एक महीने के दोनों पक्षों में शुक्लपक्ष देवताओं का कार्यकाल है और कृष्णपक्ष उनका विश्रान्तिकाल है। कुछ तिथियां देवपर्व हैं जैसे – गणेशचतुर्थी, एकादशी, प्रदोष आदि तिथियां देवताओं के विशेष पर्व हैं। गणेशजी का पर्व चतुर्थी, भगवान विष्णु का पर्व एकादशी तथा इसी प्रकार भूतभावन भगवान शंकर का पर्व प्रदोष है। इस प्रकार देवताओं के विभिन्न पर्व हैं; उन पर्वों का आचार, विधान, संयम तथा पूजा vrat आदि उस देव शक्ति के अनुरूप होते हैं, जिसका वह पर्व है।

3 – पितृपर्व

अश्विन मास का कृष्णपक्ष पूरा पितृपक्ष है। यह मास पितरों के लिए दिन में मध्याह्नकाल तक भोजनकाल है। इस समय उन्हें पिण्ड का स्मरण होता है। इसके अतिरिक्त जिस दिन उनका शरीरान्त हुआ हो, वह दिन भी उन्हें स्मरण होता है। यह समय पितृ श्राद्ध का है।

इसके अतिरिक्त अमावस्या एवं संक्रांति के अवसर पर तथा विशेष तीर्थों में जाने पर प्रतिश्राद्ध का विधान है। उन तीर्थों तथा समयों में दिए गए पिण्ड से तथा ब्राह्मण भोजन-दान आदि से पितरों की तृप्ति सहज होती है, क्योंकि भाव ग्रहण के लिए उस समय वे संपर्क में होते हैं।

4 – कालपर्व

तिथि, ऋतु, माह आदि का प्रारंभ समय – जिस दिन सृष्टि की रचना हुई थी, वह तिथि पर्व है। इसी प्रकार युगों की तिथियां भी पर्व हैं। वर्ष की प्रथम तिथि तो विश्व के सभी देशों और जातियों में पर्व मानी ही जाती है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत्सर की आरम्भ तिथि है, जो भारतीय तिथि गणना में मुख्य रूप से मान्य है (gudi padwa)। अतः काल सम्बन्धी पर्व भी संक्रमण काल के दिव्यपर्वों की भांति ही हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक का काल विशेष महत्त्व रखता है।

5 – जयंती पर्व

भगवान तथा महापुरुषों का जन्मोत्सव – भारतीय संस्कृति में नश्वर रूप की तथा देश या जाति के भौतिक उत्कर्ष की कोई महत्ता नहीं है। जयंतियां मनाई जाती हैं भगवान के अवतारों की या उन महापुरुषों की, जिनका स्मरण भगवान की स्मृति को जाग्रत करता है।

भगवत्सांनिध्यप्राप्त महापुरुषों की तथा भगवान के अवतारों के अतिरिक्त दूसरे किसी की जयंती मनाना शरीर को महत्त्व देना है या भोगवृत्ति को प्रोत्साहित करना है। इसलिए भारत में रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नृसिंहचतुर्दशी, वामनद्वादशी, हनुमानजयंती, गणेशचतुर्थी, परशुरामजयंती आदि पावन पर्व मनाये जाते हैं, जिसमें परमात्मा प्रभु का स्मरण होता है तथा व्यक्ति अंतर्मुख होने की दिशा में अग्रसर होता है।

💡 विशेष सुझाव: यदि आप नियमित आध्यात्मिक साधना करते हैं, तो इन जयंती पर्वों पर उपवास रखने से मानसिक व आत्मिक चेतना का तीव्र विकास होता है।

6 – प्राणिपर्व

नाग, गाय आदि के पूजन की तिथि – हिन्दू धर्म में प्रत्येक पदार्थ तथा प्राणी के अधिष्ठातृ देवता माने जाते हैं। विश्व में जिन्हें हम साधारण प्राणी मानते हैं, उनमें भी कुछ दिव्य प्राणी हैं। नाग और गौ – ये दिव्य प्राणियों में हैं। जैसे ग्राम के अधिष्ठातृ देवता की पूजा होती है, वैसे ही ग्राम नाग की पूजा भी विशेष अवसरों पर होती है तथा इनकी पूजा के पर्व भी होते हैं। नागपञ्चमी नागदेवता की पूजा का मुख्य पर्व है।

इसी प्रकार गोमाता सर्वदेवमयी हैं। हिन्दुओं के सभी देवी-देवताओं का निवास गौ में है। शास्त्र गाय की महिमा से भरे पड़े हैं। निष्ठापूर्वक गौमाता की सेवा की जाय तो अभीष्ट फल प्राप्त करना कोई कठिन बात नहीं है। शास्त्र के अनुसार प्रत्येक हिन्दू गृहस्थ के घर में गोसेवा और नित्य गोपूजन होना ही चाहिए। भोजन से पूर्व गोग्रास देना तो भारतवासियों का नित्य कर्म है। गौमाता की पूजा का मुख्य पर्व गोपाष्टमी है, जो आनंदकंद ब्रह्मांडनायक भगवान श्री कृष्ण के गोचारण का प्रथम दिन है। मदनमोहन श्री श्याम सुन्दर ने इसी दिन गौपूजन किया था, अतः भारतवासी भी गोपाष्टमी पर्व पर समारोहपूर्वक गौपूजन करते हैं।

7 – वनस्पति पर्व

जिस तिथि में वृक्षों की पूजा तथा उनके अधिष्ठित देवता का व्रत किया जाता है – जैसे प्राणियों के अधिष्ठित देवता होते हैं, वैसे ही वनस्पतियों के भी अधिष्ठित देवता होते हैं। कुछ दिव्य वनस्पतियां हैं जिनके प्रत्यक्ष पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। भौतिक दृष्टि से इन वनस्पतियों के प्रत्यक्ष लाभ भी मनुष्य को प्राप्त होते हैं। जैसे – अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, तुलसी का पौधा, वटवृक्ष तथा निम्ब (नीम) वृक्ष, कदली (केला) वृक्ष, बिल्व (बेल) वृक्ष, आंवला वृक्ष आदि पूजने का विधान है।

इन वृक्षों के अलग-अलग अधिष्ठित देवता हैं तथा कुछ वृक्षों के पूजन के निर्धारित दिन हैं जो पर्वरूप में माने जाते हैं। जैसे पीपल की पूजा विशेष रूप से शनिवार को करने का विधान है। तुलसी की पूजा यद्यपि प्रतिदिन करनी चाहिए, परन्तु कार्तिक मास में तथा वैकुण्ठ चतुर्दशी आदि तिथियों पर इसका विशेष महत्त्व माना गया है। देवोत्थापिनी एकादशी के दिन तो तुलसी के साथ भगवान का विवाह भी कराया जाता है।

विभिन्न वृक्षों के पूजन का विधान: अमावस्या को वटवृक्ष के पूजन का विशेष विधान है। केले का पूजन विशेष रूप से बृहस्पतिवार को करने का विधान है। इसी प्रकार बिल्व वृक्ष का पूजन सोमवार को होता है। इन वनस्पतियों के पत्र और फल भी भगवान की पूजा में प्रयुक्त होते हैं। बिल्वपत्र तथा बिल्व फल भूतभावन सदाशिव की पूजा में चढ़ाये जाते हैं। तुलसी पत्र भगवान विष्णु (शालग्राम) की पूजा में चढ़ाना अनिवार्य है।

शीतलाष्टमी पर शीतला माता के साथ निम्ब वृक्ष की पूजा होती है। इसी प्रकार कार्तिक मास में अक्षयनवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजन की बड़ी महिमा है। इस दिन इस वृक्ष के नीचे बैठकर इसकी जड़ में दूध से पितरों का तर्पण करना चाहिए तथा वृक्ष के नीचे बैठकर ही ब्राह्मण भोजन, दान तथा स्वयं भोजन का शास्त्रों में विशेष पुण्य बताया है।

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8 – मानव पर्व

यज्ञ, कथा, सत्संग आदि – मानव पर्व तीन प्रकार के होते हैं:

  • प्रथम वर्ग: ऐसे पर्व जो सामाजिक रूप से मनाये जाते हैं, जैसे कोई यज्ञ, कथा, सत्संग आदि। कृषि, उद्योग तथा व्यापार आदि में भी देवपूजन का विशेष महत्त्व माना गया है। समष्टि रूप से भी इनके पर्व मनाये जाते हैं जैसे – विश्वकर्मा पूजा, नवानेष्टि यज्ञ, वसंतपंचमी पर सरस्वती पूजन, दीपावली पर लक्ष्मी पूजन आदि।
  • द्वितीय वर्ग: ये पर्व व्यक्ति के निजी जीवन से सम्बंधित होते हैं। जैसे – पुत्रजन्मोत्सव, विवाहमहोत्सव, नवीन गृह का गृहप्रवेश, ये सब व्यक्ति के पर्व हैं। इनमें भी जप, vrat, हवन, पितरों एवं देवताओं का अर्चन, ब्राह्मणों का पूजन तथा दान, प्रतिगोष्ठी आदि उत्सव किये जाते हैं।
  • तृतीय वर्ग: किसी विशेष उद्देश्य से किए गए पूजन तथा समारोह। ऐसे पर्वों का कोई समय निश्चित नहीं रहता; हमारी श्रद्धा-भक्तिभावना ही इन उत्सवों का कारण होती है। जैसे – भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ, यज्ञसत्र, पुराणसत्र, कथा-कीर्तन, पूजन-सत्संग आदि इन पर्वों के मुख्य अंग हैं।

9 – तीर्थ पर्व

जहां भगवान के अवतार हुए और दिव्य धामों का भी प्राकट्य हुआ – विश्व में जितने प्रकार के प्राणी हैं, उनमें मनुष्यों की संख्या बहुत थोड़ी है। चूँकि मनुष्य योनि ही कर्मयोनि है और इसी मानव योनि में जन्म लेकर ही जीव भगवद्धाम अथवा भगवान को प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार की बात स्थान के विषय में भी है। पृथ्वी पर जितनी भूमि है, उनमें पुण्य भूमि बहुत कम है। हमारे शास्त्र भारत वर्ष को ही परम पुण्य भूमि मानते हैं:

“गायन्ति देवाः किल गीतकानी धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।”
(विष्णुपुराण २ | ३ | २४)

अर्थात: स्वर्ग में देवता लोग यह गीत गाते हैं कि वे व्यक्ति धन्य हैं जिन्होंने भारतभूमि में जन्म लिया, क्योंकि यह भारतभूमि केवल भोगभूमि नहीं बल्कि कर्मभूमि भी है। इसी पुण्य भूमि पर भगवान अवतार लेते हैं। प्रभु के अवतार के समय उनके दिव्य धामों का प्राकट्य भी इस पृथ्वी पर हो जाता है। भारत में भगवान का जहाँ-जहाँ प्राकट्य हुआ या जहाँ-जहाँ भगवान के अवतार हुए, वहाँ-वहाँ दिव्य धामों का भी प्राकट्य हुआ अर्थात वह भूमि दिव्य हो गई। ये स्थान हमारे परम पावन तीर्थ स्थल बन गए।

तीर्थों के मुख्य देवता भी होते हैं और उन तीर्थों के अनुरूप कृत्य होते हैं। जैसे – गया पितृलोक से सम्बंधित तीर्थ है, वहाँ दिए पिण्ड पितरों को अक्षय तृप्ति देते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ तीर्थों के कुछ विशेष पर्वकाल हैं जैसे – प्रयाग में माघमास। इन समयों में इन तीर्थों का अपने नित्य दिव्य धामों से अधिक निकट संपर्क हो जाता है और ग्रह योग के प्रभाव भी वहाँ पूर्णतः अनुकूल रहते हैं।

पर्वों का श्रेणी विभाग

पर्वों में होने वाले कार्यों के अनुसार भी कुछ विभाग किये जा सकते हैं। कुछ पर्व उपासना प्रधान होते हैं, कुछ vrat प्रधान, कुछ यज्ञप्रधान, कुछ स्नानप्रधान, कुछ अनुष्ठानप्रधान, और कुछ महोत्सवप्रधान पर्व हैं।

इस लेख में हमने vrat के कुछ और भेदों के बारे में विस्तार से जाना। अगले लेख में हम vrat पालन के कुछ अद्भुत पौराणिक उदाहरण देखेंगे कि किसने कौन सा व्रत धारण किया और हमें उस व्रत से क्या शिक्षा मिली या हमें किस व्रत का अनुसरण करना चाहिए।

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