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पुत्रदा एकादशी व्रत कथा, विधि और महत्व

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा,  विधि और महत्व

✍️ Pandit Rajkumar Dubey  |  🕒 14 Jul 2026  |  📂 ज्योतिष  |  ⏱ 6 मिनट पढ़ें

हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्येक वर्ष में चौबीस एकादशियाँ होती हैं। परन्तु जब अधिकमास या जिसे मलमास के नाम से जाना जाता है वो जब आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा है। इसके सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

एकादशी व्रत विधि

व्रती को चाहिए कि दशमी के सूर्यास्त के पहले भोजन कर लेना चाहिए। एकादशी को प्रातः उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर यदि सुविधा हो तो ब्राह्मण द्वारा कलश स्थापना कराना चाहिए। ब्राह्मण की सुविधा न होने पर स्वयं कलश स्थापित कर भगवान श्री विष्णु जी की मूर्ति या चित्र को रखकर संकल्प लेकर विधिवत पूजन करना चाहिए। विष्णु भगवान के अनेक मन्त्र हैं, यदि मन्त्रों के उच्चारण में असुविधा हो तो 'श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण' का अनवरत जाप करते रहना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा

एकबार की बात है श्री युधिष्ठिर जी कहने लगे हे भगवान! श्रवण शुक्ला एकादशी का क्या नाम है? व्रत करने की विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। मधुसूदन कहने लगे कि इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। अब आप शांतिपूर्वक इसकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वाजपेयी यज्ञ का फल मिलता है।

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।

वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा – हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ली, प्रजा का पुत्र के समान पालन करता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पुत्र नहीं है, सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है?

लोमश ऋषि का मिलन और पूर्व जन्म का वृत्तांत

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मंत्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को खोज रहे थे। तभी एक आश्रम में उन्होंने महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था, इसीलिए उनका नाम लोमश पड़ा था।

सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। राजा का दुःख सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह दो दिन से भूखा-प्यासा एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्यायी हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसी कारण राजा को यह दु:ख सहना पड़ रहा है। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है।

व्रत का प्रभाव और प्राप्ति

श्री लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी। लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया और जागरण किया।

इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। इसलिए हे राजन्! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी पड़ा।

व्रत का पारण कब और कैसे करें?

व्रत का पारण सदैव सूर्योदय के बाद ही किया जाना चाहिए। वहीं, शास्त्रों में लिखा है कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले ही कर लें। द्वादशी तिथि समाप्त होने के बाद अगर पारण किया जाता है, तो उससे साधक को पाप लगता है।

एकादशी व्रत में क्या खाएं और क्या वर्जित है?

वर्जित वस्तुएं: एकादशी के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, नमक, तेल, चावल, अथवा अन्न नहीं खाना चाहिए। मसूर की दाल, चने का साग, मधु (शहद) का त्याग करना चाहिए। एकादशी पर श्री विष्णु की पूजा में मीठा पान चढ़ाया जाता है, लेकिन इस दिन पान खाना भी वर्जित है। व्रती को झूठ एवं मिथ्या भाषण से बचना चाहिए तथा दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी का महत्व

पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है, एक पौष के महीने में और दूसरी श्रावण माह में। संतान प्राप्ति की कामना के लिए इस व्रत का खास महत्व माना जाता है। मान्यता है कि जो भी दम्पति इस व्रत को पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करता है उसे संतान सुख अवश्य मिलता है। ये व्रत रखने से समस्त पापों का नाश होता है और मृत्यु के बाद मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

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