कुंडली में अरिष्ट भंग योग (Arishta Bhanga Yoga): मित्रों, पिछले लेख में हमने बालारिष्ट योग के विषय में जाना था कि जन्मकुंडली में ऐसे कौन-से अशुभ योग होते हैं जिनके कारण बालक को बाल्यावस्था में कष्ट या अल्पायु (कम आयु में मृत्यु) का सामना करना पड़ता है। परंतु ज्योतिष शास्त्र में जिस प्रकार अरिष्ट योगों का वर्णन है, उसी प्रकार अरिष्ट भंग योगों का भी प्रतिपादन किया गया है।
अरिष्ट भंग का सीधा अर्थ है—अरिष्ट योगों (अशुभ योगों) का निष्फल हो जाना। कई जातकों की कुंडली में अरिष्ट योग उपस्थित तो होते हैं, परंतु अरिष्ट भंग योग के प्रभाव से उनका अनिष्ट नहीं होता और जातक दीर्घायु होकर संकटों से सुरक्षित निकल जाता है। इस लेख में हम विस्तार से अरिष्ट भंग बनाने वाले प्रमुख ज्योतिषीय नियमों के बारे में जानेंगे।
बाल्यावस्था में अरिष्ट के कारण (ज्योतिषीय मत)
शास्त्रों के अनुसार बाल्यावस्था के अरिष्टों के संदर्भ में ज्योतिष शास्त्र का विशेष सिद्धांत है:
- 0 से 4 वर्ष की अवस्था तक: बालक को होने वाला अरिष्ट या मृत्यु तुल्य कष्ट माता के पाप/अशुभ कर्मों के कारण होता है।
- 4 से 8 वर्ष की अवस्था तक: बालक का अरिष्ट पिता के पाप कर्मों के प्रभाव से होता है।
- 8 से 12 वर्ष की अवस्था तक: बालक को कष्ट या मृत्यु अपने पूर्वार्जित (पूर्व जन्म के) पाप कर्मों के कारण प्राप्त होती है।
कुंडली में प्रमुख अरिष्ट भंग योग
यदि कुंडली में निम्नलिखित में से कोई भी एक योग उपस्थित हो, तो अरिष्ट का प्रभाव समाप्त हो जाता है:
- यदि चंद्रमा पूर्ण (पूर्णिमा के आसपास का) हो, स्वगृही हो या अपने नवांश में हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो, तो अरिष्ट भंग योग बनता है।
- यदि पूर्ण चंद्रमा उच्च या स्वगृही होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तथा उस पर पाप या शत्रु ग्रहों की दृष्टि एवं योग न हो, तो भी अरिष्ट भंग योग होता है।
- यदि गुरु (बृहस्पति), शुक्र अथवा बुध बलवान होकर केंद्र (1, 4, 7, 10 भाव) में स्थित हों और चंद्रमा पाप ग्रहों के प्रभाव से रहित हो, तो अरिष्ट भंग होता है।
- बलवान और उच्च का बृहस्पति (गुरु) यदि केंद्र स्थान में स्थित हो, तो समस्त अरिष्टों का नाश कर देता है।
- यदि लग्नेश पूर्ण बली होकर केंद्र या त्रिकोण (1, 5, 9 भाव) में बैठा हो, तो भी अरिष्ट भंग योग बनता है।
- यदि जन्म समय में अनेक ग्रह उच्च के हों और शेष ग्रह स्वगृही हों, तो अरिष्ट निष्फल हो जाता है।
- यदि राहु तीसरे (3rd), छठे (6th) अथवा ग्यारहवें (11th) भाव में बैठा हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो, तो अरिष्ट भंग योग होता है।
- यदि मेष या कर्क राशि का राहु लग्न में बैठा हो, तो शक्तिशाली अरिष्ट भंग योग बनाता है।
- यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों के वर्ग में हो, उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और चंद्रमा पूर्ण तेजस्वी (पूर्णिमा के निकट) हो।
- यदि चंद्र राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो।
- यदि चंद्रमा उच्च राशि का हो और उस पर शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो।
- यदि तुला राशि का सूर्य द्वादश (12वें) भाव में स्थित हो, तो भी अरिष्ट भंग योग होता है।
- यदि बृहस्पति मंगल के साथ स्थित हो अथवा मंगल पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो।
- यदि चौथे और दसवें भाव में स्थित पाप ग्रह अशुभ ग्रहों से घिरे हों, लेकिन केंद्र तथा त्रिकोण में शुभ ग्रह विराजमान हों।
- यदि लग्न से चौथे भाव में पाप ग्रह बैठा हो, परंतु गुरु केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो।
- यदि छठे या आठवें भाव में स्थित चंद्रमा गुरु, बुध अथवा शुक्र के द्रेष्काण में हो।
- पूर्ण चंद्रमा के दोनों ओर (द्वितीय और द्वादश भाव में) शुभ ग्रह स्थित हों।
- यदि समस्त ग्रह शीर्षोदय राशियों में स्थित हों।
- पूर्ण चंद्रमा पर केंद्र में स्थित बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो।
- यदि पूर्ण चंद्रमा पर सभी ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो, तो अरिष्ट योग भंग हो जाता है।
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