(mangal gochar) मंगल गोचर फल –
(Mars transit) ब्रह्मांड में स्थित ग्रह अपने अपने मार्ग पर अपनी अपनी गति से सदैव भ्रमण करते हुए एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। जन्म समय में एक ग्रह जिस राशि में पाए जाते हैं वह राशि उनकी जन्म कालीन राशि कहलाती है, जो कि जन्मकुंडली का आधार है। और जन्म के पश्चात किसी भी समय वे अपनी गति से जिस राशि में भ्रमण करते हुए दिखाई देते हैं, उस राशि में उनकी स्थिति गोचर कहलाती है।
चन्द्रमा के ऊपर मंगल के गोचर का फल (प्रथम भाव)
चंद्र लग्न में यदि गोचर वश मंगल हो तो उस समय कार्य सफल नहीं होते। व्यक्ति ज्वर, व्रण (घाव) और रक्त विकार से कष्ट उठाता है। आग, जहर और हथियार से शरीर कष्ट की संभावना होती है। बवासीर आदि रोगों से पीड़ित होना पड़ता है। स्त्री को भी ज्वर आदि से कष्ट होता है। दुर्जनों से कष्ट मिलता है। यात्रा में दुर्घटनाएं होती हैं। अन्य भी कई प्रकार के उपद्रव होते हैं।
चन्द्र से दूसरे भाव में मंगल के गोचर का फल
चंद्रमा से द्वितीय भाव में यदि मंगल गोचर वश जाए तो बल की हानि होती है। कार्यों में असफलता मिलती है। दुष्ट मनुष्य, चोरों, अग्नि आदि से नुकसान व धन की हानि होती है। जातक कठोर वचन बोलने वाला होता है। राज्य की ओर से भी दण्डित होने का बहुत भय रहता है। शरीर में पित्त की अधिकता से कष्ट रहता है।
चन्द्र से तीसरे भाव में मंगल गोचर का फल
चंद्रमा से तृतीय भाव में यदि मंगल गोचर वश जाए तो जातक का साहस बढ़ता है तथा उसके शत्रु पराजित होते हैं। धातुओं से धन मिलता है, निजी प्रभाव में वृद्धि होती है। राज्य कर्मचारियों या राज्य की ओर से सहायता प्राप्त होती है। तर्क शक्ति बढ़ती है, तथा धन की वृद्धि होती है।
चन्द्र से चौथे भाव में मंगल के गोचर का फल
चंद्रमा से चतुर्थ भाव में यदि मंगल गोचर वश गया हो तो शत्रुओं की वृद्धि और स्वजनों द्वारा विरोध होता है। धन व उपभोग वस्तुओं की कमी होती है। जमीन जायदाद की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। घरेलू जीवन का सुख कम होता है। ज्वर, छाती के रोग तथा रक्त विकार से उत्पन्न होने वाले रोगों से पीड़ा होती है। जातक के मान-सम्मान में कमी आती है। सर्वसाधारण से भी प्रायः विरोध रहता है। माता को कष्ट मिलता है, तथा स्वयं के मन में हिंसा तथा क्रूरता की वृत्ति जागृत होती है, तथा मन भयभीत रहता है।
चन्द्र से पांचवे भाव में मंगल गोचर फल
चंद्रमा से पंचम भाव में मंगल गोचर वश आता है, तो धन और स्वास्थ्य का नाश होता है। संतान बीमार रहती है। यदि अन्य पाप प्रभाव भी हो तो संतान की मृत्यु तक की संभावना रहती है। मन पाप कर्मों की ओर अधिक प्रवृत्त होता है। जातक के गौरव और प्रताप को विशेष धक्का लगता है, और शत्रुओं से पीड़ा होती है।
चन्द्रमा से षष्ठ भाव में मंगल के गोचर का फल
चंद्र से छठे भाव में जब मंगल गोचर वश आता है, तब धन अन्न, तांबा, स्वर्ण आदि की प्राप्ति होती है। शत्रुओं पर सरलता से विजय प्राप्त होती है व उनका नाश होता है, और जातक के स्वयं के प्रभाव में वृद्धि होती है। यदि मंगल छठे भाव में उच्चादि राशि में जाए तो स्वास्थ्य ठीक रहता है, अन्यथा स्वास्थ्य दोष रहता है।
चन्द्र से सातवें भाव में मंगल का गोचर फल
चंद्रमा से सप्तम भाव में जब मंगल गोचर में आता है तब स्वजनों को मानसिक तथा शारीरिक कष्ट होता है। भोजन वस्त्र आदि में कमी आती है। अपनी स्त्री से कलह रहती है। स्त्री का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता, भाइयों से विवाद होता है और दुख प्राप्त होता है। नेत्र विकार से पीड़ा होती है।
चन्द्र से आठवें भाव में मंगल के गोचर का फल
चंद्रमा से अष्टम भाव में जब मंगल गोचर वश आता है, तो जातक का परदेश वास होता है। कार्य में हानि होती है। पुरुषार्थ निष्फल जाता है। घाव और रोग से पीड़ा होती है। गुदा अथवा उसके समीप तथा नेत्र में रोग होता है। आघात दुर्घटना आदि से इस समय मृत्यु भी संभव है। भाइयों से अनबन रहती है। पाप कर्म में वृत्ति अधिक रहती है। जुआ आदि व्यसन में घिरे रहते हैं, और शत्रुओं से भय रहता है।
चन्द्रमा से नौवें भाव में मंगल गोचर का फल
चंद्र से नवम भाव में जब मंगल गोचर वश आता है, तो मनुष्य अनादर पाता है। घुटनों के दर्द और सूखा रोग से पीड़ित हो सकता है। शरीर में निर्बलता रहती है, भाग्य साथ नहीं देने से धन का अभाव होता है। रोजगार में बाधा उत्पन्न होती है, ऑपरेशन आदि के बिगड़ने की संभावना रहती है। मनुष्य शत्रुओं से पराजित होता है। धर्म के विरुद्ध आचरण करता है तथा भाइयों से कष्ट पाता है।
चन्द्रमा से दशवें भाव में मंगल का गोचर फल
चंद्र से दशम भाव में मंगल जब गोचर वश आता है, तब तामसिक भोजन प्राप्त होता है। शरीर में आघात आदि द्वारा रोग होता है, किसी भी कारणवश घर से बाहर रहना पड़ता है। रोजगार में विघ्न बाधाएं आती हैं। चोरों का भय भी रहता है, परंतु वराहमिहिर (वाराही संहिता) के अनुसार दशम भाव से गोचर वश जाने वाला मंगल धन की प्राप्ति करवाता है। हमारे विचार में धन प्राप्ति का फल गोचर अवधि के उत्तरार्ध में ही संभव मानना चाहिए।
चन्द्र से ग्यारहवें भाव में मंगल गोचर का फल
चंद्रमा से एकादश भाव में जब मंगल गोचर वश जाता है, तब जय, आरोग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। आय में आशातीत वृद्धि होती है। भूमि आदि के लाभ का यह उपयुक्त समय रहता है। मकान के किराए की आय में वृद्धि होती है। भाइयों की वृद्धि होती है, तथा व्यक्ति को उनसे लाभ भी रहता है। कार्यों में सफलता मिलती है।
चन्द्रमा से बारहवें भाव में मंगल के गोचर का फल
चंद्र से द्वादशवें भाव में गोचर वश जब मंगल आता है, तो धन का व्यय होता है तथा घर से दूर जाना पड़ता है। मनुष्य नेत्र रोग से पीड़ित होता है, भाइयों में अनबन रहती है। मानहानि देता है, स्त्री को कष्ट होता है तथा उससे कलह होती है। पुत्रों को भी कष्ट की प्राप्ति होती है।


