|| श्री गणेशाय नमः || 35+ वर्षों का अविश्वसनीय अनुभव 91 7470934089

nag panchami – नांग पंचमी व्रत की विधि कथा एवं महत्त्व .

✍️ pt.rajguru@gmail.com  |  🕒 July 20, 2026  |  ⏱ 0 मिनट पढ़ें

Nag panchami – श्रावण शुक्ल पंचमी: नागपंचमी के दिन प्रातः उठकर घर की सफाई कर नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात स्नान कर साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजन के लिए सेंवई-चावल आदि ताजा भोजन बनाएँ। कुछ प्रान्तों में ऐसी मान्यता है कि नागपंचमी से एक दिन पूर्व ही भोजन बना कर रख लिया जाता है और नागपंचमी के दिन बासी खाना खाया जाता है।

इसके बाद दीवार पर गेरू पोतकर पूजन का स्थान बनाया जाता है। फिर कच्चे दूध में कोयला घिसकर उससे गेरू पुती दीवार पर घर जैसा बनाते हैं और उसमें अनेक नागदेवों की आकृति बनाते हैं। कुछ जगहों पर सोने, चांदी, काठ व मिट्टी की कलम तथा हल्दी व चंदन की स्याही से अथवा गोबर से घर के मुख्य दरवाजे के दोनों बगलों में पाँच फन वाले नागदेव अंकित कर पूजते हैं।

सर्वप्रथम नागों की बांबी में एक कटोरी दूध चढ़ा आते हैं। बांबी को साँपों का घर माना जाता है। और फिर दीवार पर बनाए गए नागदेवता की दधि, दूर्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, जल, कच्चा दूध, रोली और चावल आदि से पूजन कर सेंवई व मिष्ठान से उनका भोग लगाते हैं। पश्चात आरती कर कथा श्रवण करना चाहिए।

सावन सोमवार व्रत विधि एवं कथा का महत्त्व

उत्सवप्रियता भारतीय जीवन की प्रमुख विशेषता है। देश में समय-समय पर अनेक पर्वों एवं त्यौहारों का भव्य आयोजन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला nag panchami (नागपंचमी) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्योहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। वेद और पुराणों में नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नि कद्रू से माना जाता है। नागों का मूलस्थान पाताललोक प्रसिद्ध है। पुराणों में नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी विख्यात है। संस्कृत कथा-साहित्य में विशेषरूप से ‘कथासरित्सागर’ नागलोक और वहाँ के निवासियों की कथाओं से ओतप्रोत है।

गरुडपुराण, भविष्यपुराण, चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, भावप्रकाश आदि ग्रंथों में नाग सम्बंधी विविध विषयों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में यक्ष, किन्नर और गंधर्वों के वर्णन के साथ नागों का वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान शिव और गणेशजी के अलंकरण में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। योगसिद्धि के लिये जो कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत की जाती है, उसको सर्पिणी कहा जाता है। पुराणों में भगवान सूर्य के रथ में द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है, जो क्रमशः प्रत्येक मास में उनके रथ के वाहक बनते हैं। इस प्रकार अन्य देवताओं ने भी नागों को धारण किया है। नागदेवता भारतीय संस्कृति में देवरूप में स्वीकार किये गये हैं।

कश्मीर का प्रसिद्ध अनंतनाग

कश्मीर के जाने-माने संस्कृत कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर की सम्पूर्ण भूमि को नागों का अवदान माना है। वहाँ के प्रसिद्ध नगर अनंतनाग का नामकरण इसका ऐतिहासिक प्रमाण है। देश के पर्वतीय प्रदेशों में नागपूजा बहुतायत से होती है। यहाँ नागदेवता अत्यंत पूज्य माने जाते हैं। हमारे देश के प्रत्येक ग्राम-नगर में ग्रामदेवता और लोकदेवता के रूप में नागदेवताओं के पूजा स्थल हैं। भारतीय संस्कृति में सायं-प्रातः भगवत्स्मरण के साथ अनंत तथा वासुकि आदि पवित्र नागों का नाम स्मरण भी किया जाता है, जिनसे नागविष और भय से रक्षा होती है तथा सर्वत्र विजय होती है।

नाग पंचमी का महत्त्व देवी भागवत में

देवीभागवत में प्रमुख नागों का नित्य स्मरण किया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नागोपासना में अनेक व्रत-पूजन का विधान किया है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी नागों को अत्यंत आनंद देने वाली है—‘नागानामानंदकरी’। पंचमी तिथि को नाग पूजा में उनको गौ-दुग्ध से स्नान कराने का विधान है। कहा जाता है कि एक बार मातृ-शाप से नागलोक जलने लगा था। इस दाह पीड़ा की निवृत्ति के लिये nag panchami को गोदुग्ध स्नान जहाँ नागों को शीतलता प्रदान करता है, वहीं भक्तों को सर्प भय से मुक्ति भी देता है। नागपंचमी की कथा के श्रवण का बड़ा महत्व है। इस कथा के प्रवक्ता सुमंत मुनि थे तथा श्र्रोता पाण्डववंश के राजा शतानीक थे।

नाग पंचमी की प्रामाणिक व्रत कथा

कथा इस प्रकार है — एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्रमंथन द्वारा चौदह रत्नों में उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न प्राप्त किया था। यह अश्व अत्यंत श्वेत वर्ण का था। उसे देखकर नागमाता कद्रू तथा विमाता विनिता दोनों में अश्व के रंग के सम्बंध में वाद-विवाद हुआ। कद्रू ने कहा कि अश्व के केश श्याम वर्ण के हैं। यदि मैं अपने कथन में असत्य सिद्ध होऊँ तो मैं तुम्हारी दासी बनूँगी अन्यथा तुम मेरी दासी बनोगी। কद्रू ने नागों को बाल के समान सूक्ष्म बनाकर अश्व के शरीर में आवेष्टित होने का निर्देश किया, किंतु नागों ने अपनी असमर्थता प्रकट की। इस पर कद्रू ने क्रुद्ध होकर नागों को शाप दिया कि पाण्डववंश के राजा जनमेजय नाग यज्ञ करेंगे, उस यज्ञ में तुम सब जलकर भस्म हो जाओगे।

नागमाता के शाप से भयभीत नागों ने वासुकि के नेतृत्व में ब्रह्माजी से शाप निवृत्ति का उपाय पूछा, तो ब्रह्मा जी ने निर्देश दिया—यायावरवंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारु तुम्हारे बहनोई होंगे। उनका पुत्र आस्तीक तुम्हारी रक्षा करेगा। ब्रह्माजी ने पंचमी तिथि को नागों को यह वरदान दिया था, इसी तिथि पर आस्तीक मुनि ने नागों का परिरक्षण (रक्षा) किया था। अतः नागपंचमी का यह व्रत ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

शास्त्रोक्त व्रत की विधि और पूजन मंत्र

हमारे धर्म ग्रंथों में श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपूजा का विधान है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है। नाग पूजन में निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण कर नागों को प्रणाम किया जाता है:

सर्वे नागाः प्रीयंतां मे ये केचित पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता॥

ये नदीषु महानागा या सरस्वतिगामिनः ।
या च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः ॥

(भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व ३२।३३-३४)

मंत्र का भावार्थ: जो नाग पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य की किरणों, सरोवरों, वापी, कूप तथा तालाब आदि में निवास करते हैं, वे सब हम पर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं।

नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्यपुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है। भारत धर्मप्राण देश है। भारतीय चिंतन प्राणी मात्र में आत्मा और परमात्मा के दर्शन करता है एवं एकता का अनुभव करता है—

"समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।।"

यह दृष्टि ही जीव मात्र – मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग – सभी में ईश्वर के दर्शन कराती है और जीवों के प्रति आत्मीयता और दया भाव को विकसित करती है।

साँप: प्रकृति और कृषकों के रक्षक (मंगला गौरी व्रत प्रसंग)

भारत देश मूलतः एक कृषिप्रधान देश है। साँप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे 'क्षेत्रपाल' भी कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान पहुँचाने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके साँप हमारे खेतों को हरा-भरा रखता है। साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के भीतर के अच्छे गुणों को देखने के लिए हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रेय की ऐसी ही शुभ दृष्टि थी, इसी कारण उन्हें प्रत्येक जीव व वस्तु से कुछ न कुछ सीखने को मिला।

साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले या छेड़ने वालों को ही वह काटता है। साँप भी प्रभु का ही एक सुंदर सृजन है। वह यदि बिना किसी को नुकसान पहुँचाए सरलता से जीता हो, तो उसे अकारण मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए यदि वह हमें काट दे, तो उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकता। हमारे प्राण लेने वालों के विरुद्ध क्या हम भी आत्मरक्षा का प्रयास नहीं करते?

साँप को सुगंध बहुत ही भाती है। इसलिए चंपा के पौधे से लिपटकर वह रहता है या फिर चंदन के वृक्ष पर निवास करता है। केवड़े के वन में भी वह आनंद से विचरता है। उसे सुगंध प्रिय लगती है, इसलिए वह हमारी संस्कृति को भी अत्यंत प्रिय है। इसी प्रकार प्रत्येक मानव को अपने जीवन में सद्गुणों और सुविचारों की सुवास को अपनाना चाहिए।

इन्हें भी देखें

संबंधित लेख

बहुला चौथ की पूजा विधि, कथा और महत्व

पूरा पढ़ें

hariyali teej – कैसे मनाई जाती है हरियाली तीज की सम्पूर्ण

पूरा पढ़ें

mangala gauri vrat-मंगला गौरी व्रत कथा,पूजन विधि सहित

पूरा पढ़ें

अपनी समीक्षा लिखें

ज्योतिषीय परामर्श केंद्र

विश्वसनीय समाधान • 35+ वर्षों का अनुभव


जीवन की कठिन समस्याओं, सटीक जन्मकुंडली विश्लेषण एवं वैदिक वास्तु के प्रामाणिक समाधान हेतु संपर्क करें।

शीघ्र संपर्क हेतु कॉल करें: +91 7470934089

व्हाट्सएप चैट: सीधे संवाद शुरू करें (Click to Chat)

हमारे मुख्य परामर्श केंद्र: जबलपुर एवं रायपुर (अपॉइंटमेंट द्वारा व्यक्तिगत भेंट संभव)

✦ आपकी गोपनीयता और समाधान हमारा परम संकल्प है ✦

Fill in your Details to Know your Kundli !