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पितृ तर्पण विधि एवं मन्त्र

✍️ pt.rajguru@gmail.com  |  🕒 August 28, 2020  |  ⏱ 0 मिनट पढ़ें

पितृ तर्पण की सम्पूर्ण विधि मन्त्रों सहित

Pitru Tarpan Vidhi: भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितर पक्ष 16 दिन का होता है। इस अवधि में लोग अपने पितरों का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिए पिण्ड दान करते हैं। इसे सोलह श्राद्ध भी कहा जाता है। पितर पक्ष पितरों अर्थात पूर्वजों के लिए समर्पित है। इसकी विधि लगभग सभी प्रान्तों में एक जैसी ही है। भाद्रपद पूर्णिमा को पितरों का आवाहन होता है तथा आश्विन अमावस्या को विदा किया जाता है। इन सोलह दिनों में दूध में तिल, चावल, जौ, मिलाकर स्नान कर गीले वस्त्रों में ही उपरोक्त सामग्री अंजलि में लेकर मन्त्रों के साथ देव, ऋषि, यम, पितर और भीष्म तर्पण किया जाता है।

पितर पक्ष का महत्व

हमारे हिन्दू वेद-शास्त्रों में देव पूजा के साथ पितरों की पूजा का भी विधान है। कहते हैं कि यदि पितर प्रसन्न हों तो देवता भी जल्दी प्रसन्न होते हैं। इसीलिए हमारे मानव धर्म में घर के बड़े बुजुर्गों का आदर सम्मान किया जाता है। मृत्योपरांत देश काल के अनुसार उनका श्राद्ध किया जाता है। इसके बाद पितर पक्ष में तर्पण किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का तर्पण न किया जाय तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा भटकती रहती है।

हमारे ज्योतिष शास्त्र में भी पितर पक्ष को माना जाता है। ज्योतिष में ग्रहों की एक विशेष स्थिति को पितृ दोष माना जाता है। यह दोष काफी हानिकारक होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति सफलता के नजदीक पहुंचकर आखिरी में असफल हो जाता है। संतान उत्पत्ति में तथा संतान सुख में परेशानियां आतीं हैं। धन हानि होती रहती है। यदि किसी जातक की कुंडली में पितृ दोष है तो उसकी शान्ति अवश्य करानी चाहिए।

श्राद्ध कब करें? (Pitru Tarpan Vidhi)

शास्त्रों के अनुसार जिस तिथि में हमारे प्रियजन का स्वर्गवास हुआ हो पितर पक्ष में उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। किन्तु यदि आपको उनकी तिथि याद न हो तो पितरमोक्ष अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए। ध्यान रखें जिन व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए। यदि किसी कारणवश अमावस्या को श्राद्ध न कर सकें तो पिताजी के लिए अष्टमी तथा माता जी के लिए नवमी तिथि श्राद्ध करने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

पितृ तर्पण की विधि

प्रथम स्नान करके गीले वस्त्र धारण किए हुए पूर्वाभिमुख बैठकर मानसिक शुद्धि का मंत्रोच्चारण करें:

"ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः।।"

तत्पश्चात् आचमन करें:

"ऊँ केशवाय नमः। ऊँ नारायणाय नमः। ऊँ माधवाय नमः।।"

आचमन के बाद दोनों हाथों में कुशा की पवित्री पहनकर हाथ में कुश, जल, दूध मिश्रित चावल, काले तिल, तथा जौ लेकर संकल्प पढ़ें। (जहां-जहां अमुक शब्द का प्रयोग किया गया है वहां गोत्र, मास, पक्ष, तिथि, दिन आदि का उच्चारण करना चाहिए):

"ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अमुक गोत्रः श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणः द्वितीय प्रहराद्धे वैवस्वतमन्वन्ते अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथम चरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे भागीरथ्याः पश्चिमे तीरे विक्रम शके बौद्धावतारे अमुक संवत्सरे अमुकायने अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ च अमुकवासरे चन्द्र सूर्ये गुरौ च देवर्षि मनुष्य पितृ तर्पणमहं करिष्ये।।"

देव तर्पण

तत्पश्चात् हाथ में कुश तथा मिश्रित सामग्री लेकर निम्नलिखित आवाहन करें। देवताओं के नाम के आगे 'तृप्यताम्' बोलें:

"ऊँ ब्रह्मादयो देवा आगच्छन्तु गृहणत्वेतां जलान्जलीन्।
ऊँ ब्रह्मतृप्यताम्। ऊँ विष्णूस्तृप्यताम्। ऊँ रुद्रस्तृप्यताम्। ऊँ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ऊँ देवास्तृप्यताम्। ऊँ छन्दांसि तृप्यताम्। ऊँ वेदास्तृप्यताम्। ऊँ ऋषयस्तृप्यताम्। ऊँ पुराणाचार्यास्तृप्यताम्। ऊँ गन्धर्वास्तृप्यताम्। ऊँ इतराचार्यास्तृप्यताम्। ऊँ संवत्सरसावयवस्तृप्यताम्। ऊँ देव्यस्तृप्यताम्। ऊँ अप्सरस्तृप्यताम्। ऊँ देवानुगास्तृप्यताम्। ऊँ नागास्तृप्यताम्। ऊँ सागरास्तृप्यताम्। ऊँ पर्वतास्तृप्यताम्। ऊँ सरितस्तृप्यताम्। ऊँ मनुष्यास्तृप्यताम्। ऊँ रक्षास्तृप्यताम्। ऊँ रक्षांसि तृप्यताम्। ऊँ पिशाचास्तृप्यताम्। ऊँ सुपर्णास्तृप्यताम्। ऊँ भूतानि तृप्यताम्। ऊँ पशवस्तृप्यताम्। ऊँ वनस्पतयस्तृप्यताम्। ऊँ ओषधयस्तृप्यताम्। ऊँ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्।।"

ऋषि तर्पण

इन ऋषियों को भी पूर्वमुख सव्य होकर देववत् तर्पण करना चाहिए:

"ऊँ मरिच्यादि दश ऋषयः आगच्छन्तु गृहणत्वेतां जलान्जलीन्।।
ऊँ मरीचिस्तृप्यताम्। ऊँ अत्रिस्तृप्यताम्। ऊँ अंगिरास्तृप्यताम्। ऊँ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ऊँ पुलहस्तृप्यताम्। ऊँ क्रतुस्तृप्यताम्। ऊँ प्रचेतास्तृप्यताम्। ऊँ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ऊँ भृगुस्तृप्यताम्। ऊँ नारदस्तृप्यताम्।।"

दिव्य मनुष्य तर्पण

उत्तर मुख होकर जनेऊ/गमछा कण्ठी के समान कन्धे पर रखकर दो-दो अंजली जल कुश और यव के साथ निम्न सात मुनियों को दें:

"ऊँ सनकादयः सप्तमुनयः आगच्छन्तु गृहणत्वेतां जलान्जलीन्।।
ऊँ सनकस्तृप्यताम्। ऊँ सनन्दनस्तृप्यताम्। ऊँ सनातनस्तृप्यताम्। ऊँ कपिलस्तृप्यताम्। ऊँ आसुरिस्तृप्यताम्। ऊँ वोढुस्तृप्यताम्। ऊँ पञ्चशिखस्तृप्यताम्।।"

दिव्य मनुष्य पितृतर्पणम्

दक्षिणाभिमुख होकर अपसव्य (अपसव्य में जनेऊ दांये कंधे पर आ जाता है) होकर तीन-तीन अंजली जल दें:

"ऊँ काव्यवाडवानलादयो दिव्य पितर आगच्छन्तु गृहणत्वेतां जलान्जलीन्।।
ऊँ काव्यवाडवानलस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ सोमस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ यमस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ अर्यमा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ सोमपाः पितरस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा। ऊँ बर्हिषदः पितरस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।"

यमादि तर्पणम्

बाएं घुटने को जांघ के नीचे दबाकर दक्षिणाभिमुख बैठ तीन-तीन अंजली जल निम्न 14 यमों को दें:

"ऊँ यमादि चतुर्दश देवा आगच्छन्तु गृहणत्वेतां जलान्जलीन्।।
ऊँ यमाय नमः। ऊँ धर्मराजाय नमः। ऊँ मृत्यवे नमः। ऊँ अन्तकाय नमः। ऊँ वैवस्वताय नमः। ऊँ कालाय नमः। ऊँ सर्वभूतक्षयाय नमः। ऊँ औदुम्बराय नमः। ऊँ दध्नाय नमः। ऊँ नीलाय नमः। ऊँ परिमेष्ठने नमः। ऊँ वृकोदराय नमः। ऊँ चित्राय नमः। ऊँ चित्रगुप्ताय नमः।।"

पिता, पितामह एवं प्रपितामह का तर्पण

तत्पश्चात् पितरों को कुश, मोटक, तिलों के साथ तीन-तीन अंजली जल दें:

"नाभिमात्रे जले स्थित्वा चिन्तयेद् धूर्वमानसः।
आगच्छन्तु मे पितर इमान् गृहणत्वेतां जलान्जलीन्.।"

पिता का तर्पण (तीन बार दोहराएं):

"ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्पिता वसुस्वरूपस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।"

पितामह (दादा) का तर्पण (तीन बार दोहराएं):

"ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्पितामहो रुद्रस्वरूपस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।"

प्रपितामह (परदादा) का तर्पण (तीन बार दोहराएं):

"ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्प्रपितामहो आदित्यस्वरूपस्तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।"

माता, पितामही तथा प्रपितामही का तर्पण

"ऊँ अमुक गोत्रो अस्मन्माता अमुकी देवी गायत्री स्वरूपा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।
ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्पितामही अमुकी देवी सावित्री स्वरूपा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।
ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्प्रपितामही अमुकी देवी सरस्वती स्वरूपा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा।।
ऊँ अमुक गोत्रो अस्मत्सापत्नीमाता अमुकी देवि वसुस्वरूपा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा.।"

भीष्म तर्पणम् (सव्येन)

पुनः सव्य होकर आचमन कर भीष्म तर्पण करें:

"ऊँ वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवरय च। अपुत्राय ददाम्येतज्जलं भीष्माय वर्मणे।।"

भीष्म को जल देने के बाद सूर्य को निम्न मंत्र से जल दें:

"एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्प्य मां भक्त्या गृहाणाध्यर् दिवाकर।।"

पितर मोक्ष अमावस्या के दिन तर्पण करने के पश्चात् निम्न श्लोक से अपसव्य होकर तीन अंजली जल दें तथा कुशा विसर्जित कर दें। कुशा विसर्जन करते समय मोटक को खोल देना चाहिए:

"गयायां पितृरूपेण त्वयमेव जनार्दनः। तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्ष मुच्यते च ऋणत्रयात्।।"

निष्कर्ष

पितृ तर्पण हमारी सनातन संस्कृति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अत्यंत पवित्र साधन है। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष या अन्य ग्रहों की बाधा है, तो योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें और विधि-विधान से शांति कराएं।

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