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व्रत उपवास के नियमों का शास्त्रीय महत्व

✍️ pt.rajguru@gmail.com  |  🕒 July 14, 2026  |  ⏱ 0 मिनट पढ़ें

पिछले लेख में हमने "व्रत अनुष्ठान की महिमा" इस बारे में संक्षेप में चर्चा की थी। इस लेख में हम "व्रत एवं उपवास पूर्ण शास्त्रीय विधि से संपन्न होने चाहिए" इस विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि आपके द्वारा किए जाने वाले उपवास (upvas) का पूर्ण आध्यात्मिक व मानसिक लाभ आपको प्राप्त हो सके।

भारत: उत्सव और संस्कारों का प्रधान देश

धर्मप्राण भारतवर्ष मूलतः महोत्सव प्रधान देश है। हमारे सभी अवतार, देवी-देवता और ऋषि-मुनि व्रत व महोत्सवों को अत्यधिक महत्त्व देते हैं। यहाँ मानव जीवन की शुरुआत से लेकर मृत्यु संस्कार तक सब कुछ एक महोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। सनातन धर्मी हिन्दू परिवार में जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो उसके उपलक्ष्य में नामकरण, यज्ञोपवीत, वाग्दान, विवाह और अंत में पूरी आयु प्राप्त कर मृत्यु को प्राप्त होने वाले की शवयात्रा भी एक विशेष शुचिता व उत्सव के रूप में मनाई जाती रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक कार्य पूर्ण शास्त्रीय विधि से संपन्न किया जाता रहा है।

पुराणों के अनुसार उपवास (upvas) की महत्ता

शास्त्रों में व्रत और उपवास के लिए कुछ अनिवार्य आंतरिक नियमों का उल्लेख है। गरुड़ पुराण के अनुसार, व्रतधारी व्यक्ति के लिए क्रोध, लोभ तथा मोह को सर्वथा त्याज्य बताया गया है। इनके रहते व्रत का फल निष्फल हो जाता है। वहीं, भविष्य पुराण में व्रत के आठ स्तंभों का वर्णन करते हुए कहा गया है—

क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
देवपूजाग्निहवनं संतोषः स्तेयवर्जनम् ॥

अर्थात, व्रताचार के दौरान क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच (आंतरिक व बाह्य पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह (संयम), देवपूजा, अग्निहोत्र (अग्निहवन) और संतोष का आचरण करने से ही वास्तविक व्रत का पुण्य प्राप्त होता है।

उपवास (upvas) के समय पालनीय नियम

व्रत के दौरान शास्त्रों ने कुछ अत्यंत कड़े और स्पष्ट आदेश दिए हैं जिनका पालन हर व्रती को करना चाहिए:

  • अन्न व फल का नियम: व्रत के दौरान किसी दूसरे का अन्न या फल आदि ग्रहण नहीं करना चाहिए। स्वयं के सात्विक साधनों से अर्जित आहार ही लें।
  • वाणी का संयम: अनर्गल वार्तालाप, निंदा या चुगली न करके प्रायः मौन रहना चाहिए और मन ही मन प्रभु के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए।
  • ईश्वर चिंतन व स्वाध्याय: पूरा दिन ईश्वर का चिंतन करने तथा सत्यसाहित्य (धार्मिक ग्रंथों) के अध्ययन में बिताना चाहिए।
  • नदियों के तट पर नियम: यदि आप व्रत के दौरान भगवती भागीरथी गंगा, यमुना, नर्मदा या सरयूजी के अति पावन तट पर हों, तो नदियों की पवित्रता बनाए रखने का पूरा ध्यान रखें। नदी में स्नान करते समय भूलकर भी तेल या साबुन का प्रयोग न करें।
  • सत्संग: संत-महात्माओं का सत्संग और धर्मशास्त्रों का अध्ययन व्रत-उपवास को और भी अधिक सार्थक बनाने वाला सिद्ध होता है।

शंकराचार्य स्वामी जी का उपवास संदेश

महंत वीतराग संत शंकराचार्य स्वामी श्रीकृष्णबोधाश्रमजी महाराज व्रत-उपवास के दौरान कठोर संयम बरतने की प्रेरणा देते थे। उनका मार्गदर्शन था कि चौबीस घंटे में केवल एक बार अल्पाहार के रूप में फल और दूध ग्रहण करना चाहिए तथा सांसारिक कार्यों व प्रपंचों से सर्वदा निर्लिप्त रहना चाहिए, तभी मन की एकाग्रता प्रभु चरणों में लग पाती है।

आधुनिकता के भ्रम में अपनी परंपराएं न त्यागें

आजकल आधुनिकता तथा विज्ञान की चकाचौंध में फंसे हुए कुछ कथित उपदेशक यह कहते सुने जाते हैं कि 'एकादशी का अर्थ उपवास (भूखा रहना) नहीं है, अपितु केवल ग्यारह नियमों का पालन करना ही एकादशी है।' किन्तु हमें इस प्रकार की मनगढ़ंत बातों पर ध्यान न देकर हमारे प्रामाणिक धर्मशास्त्रों तथा प्राचीन सनातन परंपरा के अनुसार ही व्रत-उपवास रखने चाहिए। यह सत्य है कि दुष्प्रवृत्तियाँ त्याग कर सद्गुणों का पालन करना भी एक प्रकार का संकल्प-व्रत ही है; परन्तु असत्य, हिंसा, निंदा, चुगली आदि का त्याग केवल एकादशी या व्रत के दिन ही वर्जित नहीं है, अपितु इनका तो जीवन में सर्वथा-सर्वदा के लिए त्याग करना चाहिए। व्रत और उपवास कायिक, मानसिक और वाचिक तप हैं, जिनके माध्यम से लोक और परलोक दोनों का कल्याण सुनिश्चित होता है।

पाश्चात्य देशों का अंधानुकरण और सनातन संस्कृति

हमारी गौरवशाली परंपरा में बच्चों के जन्मदिवस पर उन्हें वृद्धजनों से आशीर्वाद दिलवाने, संत-महात्माओं के दर्शन कराने तथा मंदिर ले जाकर पूजा-अर्चना कराने की दिव्य परंपरा थी। किन्तु आज पाश्चात्य देशों का अंधानुकरण कर केक कटवाया जाने लगा है। मोमबत्तियां जलाकर उन्हें बच्चों के मुंह से फूंक लगवाकर बुझवाया जाता है। सनातन संस्कृति में दीपक जलाना शुभ माना जाता है, जबकि दीपक या मोमबत्ती बुझाना स्पष्ट रूप से अमंगल का प्रतीक है। यह पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण नहीं तो और क्या है?

सच्चे मार्गदर्शक की पहचान

हमें सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे वास्तविक धर्माचार्य, संत-महात्मा तथा गुरु वे ही हो सकते हैं जो हमें शास्त्रों के अनुसार चलने की प्रेरणा देकर हमारा जीवन सफल बनाने का मार्ग प्रशस्त करें। जो स्वयं धर्मशास्त्रों के विपरीत मनमाने ढंग से जीवन बिताते हैं तथा हमें भी मनमाने ढंग से मर्यादाहीन जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं, वे हमारे सच्चे धर्मगुरु या मार्गदर्शक कभी नहीं हो सकते।

इस लेख में हमने "व्रत एवं उपवास पूर्ण शास्त्रीय विधि से संपन्न होने चाहिए" इस बारे में संक्षेप में चर्चा की। अगले लेख में हम सनातन धर्म के "तीन महाव्रत" विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

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