वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जन्मकुंडली का आठवाँ भाव (अष्टम भाव) आयु, गुप्त विद्याओं, मानसिक तनाव, पैतृक संपत्ति और जीवन के अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव का स्थान माना जाता है। आठवें भाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चंद्रमा के प्रभाव से जातक को माताजी का पूर्ण सुख प्राप्त करने में कठिनाई होती है, तथा माताजी के स्वास्थ्य को लेकर व्यक्ति हमेशा चिंतित रहता है।
अचल संपत्ति, भूमि विवाद और मानसिक तनाव
अष्टमस्थ चंद्रमा के प्रभाव से व्यक्तियों को भूमि के व्यापार में हानि उठानी पड़ती है। ऐसे जातकों को भूमि और भवन के लेन-देन में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है, क्योंकि अक्सर ऐसे व्यक्ति विवादित भूमि की उलझनों में उलझ जाते हैं।
अचल संपत्ति की प्राप्ति में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनेक कुंडलियों के अध्ययन में यह पाया गया है कि अचल संपत्ति और पारिवारिक विवादों के चलते व्यक्ति के मन में अत्यधिक घबराहट या आत्महत्या जैसे विचार भी आते पाए गए हैं।
पैतृक संपत्ति, आयु एवं धन प्राप्ति के योग
अष्टमस्थ चंद्रमा व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से संबंधित विवाद तथा आयु संबंधी संकट भी उत्पन्न करता है। ऐसे जातकों के घरेलू जीवन में शांति की कमी बनी रहती है।
हालाँकि, आठवें भाव में स्थित चंद्रमा अपनी सातवीं उच्च दृष्टि से शुक्र की राशि वाले द्वितीय भाव (धन भाव) को देखता है। इस दृष्टि के कारण जातक को धन प्राप्ति के योग निरंतर मिलते रहते हैं। जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब व्यक्ति को अनायास धन प्राप्त होता है।
यदि चंद्रमा किसी शुभ ग्रह से दृष्ट हो, तभी व्यक्ति इस धन लाभ के अवसर का पूरा लाभ उठा पाता है; अन्यथा अवसर हाथ से निकल जाने के बाद पछतावा ही हाथ लगता है। व्यक्ति धन एवं सुख अर्जित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील बना रहता है।
आठवें भाव में चंद्रमा के अचूक उपाय (Moon in 8th House Remedies)
यदि आठवें भाव का चंद्रमा आपको मानसिक शांति, माता के स्वास्थ्य या धन हानि में परेशानी दे रहा हो, तो निम्नलिखित शास्त्रीय उपायों का पालन करें:
- आठवें भाव के चंद्रमा वाले जातकों को जुआ, सट्टा एवं जोखिम भरे निवेशों से हमेशा दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
- हनुमान मंदिर में चना और गुड़ का भोग लगाकर बच्चों में बांटना चाहिए।
- चने की दाल बुधवार की रात्रि को पानी में भिगोकर रखें और गुरुवार को लक्ष्मी-नारायण भगवान को भोग लगाकर बालकों में बांटें।
- पितृपक्ष में पितरों के निमित्त दान-पुण्य एवं तर्पण आदि कार्य नियमित रूप से करते रहें।
- किसी भी शुभ या नए कार्य के आरंभ से पूर्व घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद अनिवार्य रूप से लें।
- बच्चों को समय-समय पर मीठा पेय पदार्थ या शर्बत अवश्य पिलाएं।
इन्हें भी देखें:


