मित्रों, भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (krishna janmashtami) सम्पूर्ण सनातन संस्कृति में अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। प्रायः हर वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तिथि और व्रत के दिन को लेकर श्रद्धालु दुविधा में रहते हैं कि व्रत किस दिन किया जाए। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि (मध्यरात्रि) के समय हुआ था। इसी प्राचीन परंपरा के अनुसार हम आज भी इसी पावन तिथि को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं।
कृष्ण जन्म की वैदिक कथा एवं शास्त्रीय मान्यताएं
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रात के ठीक १२ बजे मथुरा नगरी के कारागार में कंस के अत्याचारों के बीच वसुदेव जी की पत्नी माता देवकी के गर्भ से षोडश कला सम्पन्न भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। पूर्ण पुरुषोत्तम विश्वम्भर प्रभु का भाद्रपद मास के अंधकारमय कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अर्धरात्रि के समय प्रादुर्भाव होना वास्तव में निराशा में आशा का संचार स्वरूप है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है:
निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दने ।
देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः ॥
आविरासीद यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः ॥
अर्थात्: अर्धरात्रि के समय जब अज्ञान रूपी अंधकार का विनाश और ज्ञान रूपी चंद्रमा का उदय हो रहा था, उस समय देवरूपिणी देवकी के गर्भ से सबके अंतःकरण में विराजमान पूर्ण पुरुषोत्तम व्यापक परब्रह्म विश्वम्भर प्रभु भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, ठीक वैसे ही जैसे पूर्व दिशा में पूर्ण चंद्र प्रकट होता है।
जन्माष्टमी व्रत के विषय में विभिन्न मत एवं नियम
शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी के व्रत में सप्तमी युक्त अष्टमी का ग्रहण निषिद्ध माना गया है। साधारणतया इस व्रत के सम्प्रदाय भेद से दो मुख्य मत देखने को मिलते हैं:
- स्मार्त मत: स्मार्तजन अर्धरात्रि का स्पर्श होने पर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी से युक्त अष्टमी में भी उपवास करते हैं।
- वैष्णव मत: वैष्णवजन सप्तमी तिथि का किंचित मात्र भी स्पर्श होने पर पूर्व दिन व्रत न करके दूसरे दिन ही उपवास करते हैं।
- निम्बार्क सम्प्रदाय: निम्बार्क सम्प्रदायी वैष्णव पूर्व दिन अर्धरात्रि से यदि कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो तो अष्टमी को व्रत न करके नवमी तिथि में ही उपवास रखते हैं।
- अन्य सम्प्रदाय: शेष वैष्णवों में उदयव्यापिनी अष्टमी एवं रोहिणी नक्षत्र को ही सर्वोपरि मान्यता एवं प्रधानता दी जाती है।
जन्माष्टमी उत्सव, श्रृंगार एवं पूजन विधि
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दिन मुख्य रूप से उपवास, रात्रि-जागरण एवं विशेष रूप से भगवान की सेवा-श्रृंगार का होता है। दिनभर उपवास रखना, रात्रि में भगवत् कीर्तन करना और यथोपलब्ध उपचारों से भगवान का पूजन करना इस उत्सव का प्रधान अंग है।
श्रीनाथद्वारा एवं ब्रज मंडल (मथुरा-वृंदावन) में यह उत्सव अत्यंत विशिष्ट ढंग से आयोजित किया जाता है। इस दिन भारतवर्ष के सभी प्रमुख मंदिरों में भगवान का भव्य श्रृंगार किया जाता है। घर-घर में और गली-मोहल्लों में कृष्णावतार के उपलक्ष्य में मनमोहक झांकियां सजाई जाती हैं तथा बाल-गोपाल की मूर्ति को झूला झुलाया जाता है।
श्रद्धालु स्त्री-पुरुष रात्रि के १२ बजे तक उपवास रखते हैं और ठीक रात के १२ बजे शंख, घड़ियाल और घण्टों की ध्वनि के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़े भाव के साथ मनाते हैं।


