Teej kab hai – हमारे हिन्दू धर्मानुसार उदया तिथि को माना जाता है। इस वर्ष हरितालिका तीज उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत 14 सितंबर 2026 सोमवार को रखा जाएगा। (नोट: पाठक कृपया वर्तमान वर्ष की उदया तिथि के अनुसार गणना करें)।
प्रातःकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त 06:03 ए एम से 07:04 ए एम तक रहेगा।
यह व्रत पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखण्ड आदि प्रांतों में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने अखण्ड सौभाग्य की रक्षा के लिये बड़ी श्रद्धा विश्वास और लगन के साथ हरतालिकाव्रत (तीज) का उत्सव मनाती हैं। जिस त्याग तपस्या और निष्ठा के साथ स्त्रियाँ यह व्रत रखतीं हैं, वह बड़ा ही कठिन है। इसमें फलाहार सेवन की बात तो दूर रही निष्ठा वालीं स्त्रियाँ जल तक ग्रहण नहीं करतीं। व्रत के दूसरे दिन प्रातः काल स्नान के पश्चात व्रत परायण स्त्रियाँ सौभाग्य द्रव्य एवं वायन छूकर ब्राम्हणों को देतीं हैं। इसके बाद जल आदि पीकर पारण करतीं हैं। इस व्रत में मुख्यरूप से शिव-पार्वती तथा गणेशजी का पूजन किया जाता है।
विस्तृत पूजन विधि
पूजन विधि (14 सितम्बर 2026) – सर्वप्रथम काली मिट्टी से भगवान भूतभावन भोले नाथ की लिंग रूप में स्थापना करना चाहिए। ध्यान रखें भगवान भोले नाथ के पुरे परिवार की पूजा होती है। सर्व प्रथम गणेशजी की प्रतिमा बनायें, फिर जिलहरी का निर्माण करें तत्पश्चात शिवलिंग का निर्माण करें। अंत में कार्तिकेय भगवान को भी स्थान दें। अपनी बात भगवान भोले नाथ तक पहुंचाने के लिए नंदी को नहीं भुलाना चाहिए। एक चौकी पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर सफ़ेद फूलों का आसन देकर भगवान को स्थान देना चाहिए। या तो ब्राम्हण के द्वारा पूजन कराना चाहिए यदि साधन न बन सके तो स्वयं पंचाक्षरी मन्त्र से भगवान की पूजा करनी चाहिए।
भगवान भोले नाथ को प्रसन्न करने के लिए रात्रि जागरण कर भगवान के चरित्र का वर्णन करना और सुनना चाहिए। भगवान भोले नाथ तथा माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए निम्नलिखित मन्त्रों का जाप करना चाहिये।
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मंत्र:
- ॐ नमः शिवाय | ॐ महेश्वराय नमः| ॐ शम्भवे नमः | ॐ हराय नमः | ॐ शूलपाणये नमः | ॐ पिनाकवृषे नमः | ॐ पशुपतये नमः |
माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए मंत्र:
- ॐ जगतद्धात्रये नमः | ॐ जगतप्रतिष्ठाये नमः | ॐ उमाये नमः | ॐ पार्वत्ये नमः| ॐ शांतिरूपिण्ये नमः |
इस व्रत को सर्व प्रथम गिरिजानंदिनी उमा ने किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुये थे। इस व्रत के दिन स्त्रियाँ वह कथा भी सुनतीं हैं जो पार्वतीजी के जीवन में घटित हुई थी। उसमें पार्वती के त्याग, संयम, धैर्य तथा एकनिष्ट पतिव्रत धर्म पर प्रकाश डाला गया है, जिससे सुनने वाली स्त्रियों का मनोबल ऊंचा उठता है।
हरतालिका व्रत कथा (Teej kab hai)
कहते हैं, दक्षकन्या सती जब पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहन कर यागाग्नि में दग्ध हो गयीं, तब वे ही मैना और हिमवान की तपस्या के फलस्वरूप उनकी पुत्री के रूप में पार्वती के नाम से पुनः प्रकट हुईं। इस नूतन जन्म में भी उनकी पूर्व की स्मृति बनी रही और वे नित्य निरंतर भगवान शिव के ही चरणारविंदों के चिंत्न में संलग्न रहने लगीं। जब वे कुछ वयस्क हो गयीं तब मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिये पिता की आज्ञा से तपस्या करने लगीं। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर बड़ी कठोर साधना की। जब उनकी तपस्या फलोन्मुख हुई तब एक दिन देवर्षि नारद जी महाराज गिरिराज हिमवान के यहाँ पधारे। हिमवान ने अहोभाग्य माना और देवर्षि की बड़ी श्रद्धा के साथ सपर्या की।
कुशल क्षेम के पश्चात नारद जी ने कहा – "भगवान विष्णु आपकी कन्या का वरण करना चाहते हैं उन्होंने मेरे द्वरा यह संदेश कहलवाया है। इस सम्बंध में आपका जो विचार हो उससे मुझे अवगत करायें।" नारद जी ने अपनी ओर से भी इस प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया। हिमवान राजी हो गये। उन्होंने स्वीकृति दे दी। देवर्षि नारद पार्वती के पास जाकर बोले – "उमे छोडो यह तपस्या, तुम्हें अपनी साधना का फल मिल गया। तुम्हारे पिता ने भगवान विष्णु के साथ तुम्हारा विवाह पक्का कर दिया है।"
इतना कहकर नारदजी चले गये। उनकी बात पर विचार करके पार्वतीजी के मन में बड़ा कष्ट हुआ। वे मूर्छित होकर गिर पड़ीं। सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने उनसे अपना शिवविषयक अनुराग सूचित किया।
सखियाँ बोलीं (teej kab hai) – "तुम्हारे पिता तुम्हें लिवा जाने के लिये आते ही होंगें। जल्दी चलो, हम किसी दूसरे गहन वन में जाकर छिप जायँ।"
ऐसा ही हुआ। उस वन में एक पर्वतीय कंदरा के भीतर पार्वती शिवलिंग बनाकर उपासना पूर्वक उसकी अर्चना आरम्भ की। उससे सदाशिव का आसन डोल गया। वे रीझकर पार्वती के समक्ष प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में वरण करने का वचन देकर अंतर्ध्यान हो गये। तत्पश्चात अपनी पुत्री का अन्वेषण करते हुए हिमवान भी वहाँ आ पहुँचे और सब बातें जानकर उन्होंने पार्वती का विवाह भगवान शंकर के साथ ही कर दिया।
अन्ततः ‘बरउँ शम्भु न त रहउँ कुआरी॥’ पार्वती के इस अविचल अनुराग की विजय हुई। देवी पार्वती ने भाद्र शुक्ल तृतीया हस्त नक्षत्र में आराधना की थी इसलिये इस तिथि को यह व्रत किया जाता है। तभी से भाद्रपद शुक्ल तीज को स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिये तथा कुमारी कन्याएँ अपने मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिये हरितालिका (तीज) का व्रत करतीं चलीं आ रहीं हैं।
“आलिभिर्हरिता यस्मात तस्मात सा हरितालिका” – सखियों के द्वारा हरी गयी, इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्रत का नाम हरितालिका हुआ। इस व्रत के अनुष्ठान से नारी को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
महत्वपूर्ण प्रश्न और नियम (teej kab hai)
तीज के व्रत में पानी कब पीना चाहिए?
नियम के अनुसार तीज का व्रत आमतौर पर निर्जला व्रत होता है, जिसका अर्थ है कि इस व्रत में पूरे दिन पानी भी नहीं पीया जाता।
तीज व्रत का नियम क्या है?
आमतौर पर तीज व्रत के निम्नलिखित नियम होते हैं:
- निर्जला व्रत: अधिकांश महिलाएं इस व्रत को निर्जला रखती हैं, यानी पूरे दिन पानी भी नहीं पीती हैं।
- शुद्धता: व्रत रखने वाली महिला को पूरे दिन शुद्ध रहना चाहिए।
- पूजा: सुबह स्नान करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
- व्रत कथा: व्रत कथा सुनना अनिवार्य माना जाता है।
- सिंदूर और मेहंदी: सुहागिन महिलाएं सिंदूर और मेहंदी लगाती हैं।
- रात में जागरण: कई महिलाएं रात में जागरण करती हैं और भजन-कीर्तन करती हैं।
- चंद्रमा को अर्घ्य: व्रत खोलने से पहले चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
- निश्चित भोजन: व्रत खोलते समय कुछ निश्चित प्रकार के भोजन का सेवन किया जाता है, जैसे कि फल, फूल और मिठाई।
निष्कर्ष
हरितालिका तीज का यह पावन व्रत भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का दर्शन कराता है जहाँ प्रेम और निष्ठा की विजय होती है। माता पार्वती का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी यदि धैर्य और अटूट विश्वास हो, तो लक्ष्य (ईश्वर) की प्राप्ति निश्चित है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए की गई एक आत्मिक साधना है। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस लेख के माध्यम से आपको Teej kab hai और इसकी पूजन विधि से जुड़ी सभी शंकाओं का समाधान मिल गया होगा।
भगवान शिव और माता पार्वती आप सभी का कल्याण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: हरितालिका तीज का व्रत क्यों रखा जाता है?
उत्तर: यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं इस व्रत को मनचाहा और योग्य वर प्राप्त करने की कामना से रखती हैं।
प्रश्न 2: Teej kab hai और इसका शुभ मुहूर्त क्या है?
उत्तर: हरितालिका तीज हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इसका सबसे उत्तम मुहूर्त ‘प्रदोष काल’ और ‘प्रातः काल’ की उदया तिथि के अनुसार माना जाता है। सटीक समय के लिए पंचांग का अनुसरण करना चाहिए।
प्रश्न 3: क्या हरितालिका तीज का व्रत कुंवारी कन्याएं रख सकती हैं?
उत्तर: हाँ, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भी भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए विवाह पूर्व ही यह कठिन तपस्या और व्रत किया था। इसलिए कुंवारी कन्याएं श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं।
प्रश्न 4: क्या इस व्रत में जल ग्रहण किया जा सकता है?
उत्तर: शास्त्रीय नियमों के अनुसार यह ‘निर्जला व्रत’ है, जिसमें अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण तक जल का त्याग किया जाता है। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी कारणों या वृद्धावस्था में फलहार के साथ व्रत रखने का विधान भी मिलता है।
प्रश्न 5: यदि एक बार यह व्रत शुरू कर दिया जाए, तो क्या इसे बीच में छोड़ सकते हैं?
उत्तर: सनातन परंपरा के अनुसार, हरितालिका तीज का व्रत एक बार शुरू करने के बाद इसे आजीवन नियमित रूप से करना चाहिए। यदि किसी वर्ष स्वास्थ्य ठीक न हो, तो घर की दूसरी महिला या पति के द्वारा इस व्रत को पूर्ण कराया जा सकता है।
प्रश्न 6: तीज व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए?
उत्तर: व्रत का पारण अगले दिन (चतुर्थी तिथि) सुबह स्नान और पूजन के पश्चात किया जाता है। ब्राह्मण को सौभाग्य सामग्री और दान-दक्षिणा देने के बाद जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।


