संतान सप्तमी व्रत 2019

कैसे करें संतान सप्तमी व्रत जानिये पूजन विधि

संतान सप्तमी व्रत पुत्र प्राप्ति पुत्र रक्षा तथा पुत्र अभ्युदय के लिए किया जाता है | इस व्रत का विधान दोपहर तक रहता है | दोपहर को चौक पूर्व कर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी तथा नारियल आदि से शिव पार्वती की पूजा की जाती है |

संतान सप्तमी व्रत 2019

इस दिन में नेवैद्ध के लिए खीर पूरी तथा गुण के पुए रखे जाते हैं | इस दिन शिव जी को डोरा भी अर्पित किया जाता है | इस डोरे को शिवजी से वरदान के रूप में लेकर धारण करके कहानी सुनी जाती है |

आज के दिन जामवंती के साथ श्याम सुंदर तथा उनके पुत्र साम्ब की पूजा की जाती है | माताएं भगवान शिव  पार्वती का पूजन करके पुत्र प्राप्ति तथा उसके अभ्युदय का वरदान मांगते हैं इस व्रत को मुक्ता भरण भी कहते हैं |

संतान सप्तमी व्रत कथा –

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि मेरे जन्म से पहले किसी समय मथुरा में लोमस ऋषि आए थे | मेरे माता-पिता देवकी तथा वासुदेव ने भक्ति पूर्वक पूजा की तो ऋषि ने आदेश दिया |

हे देवकी कंस ने तुम्हारे कई पुत्रों को पैदा होते ही मार कर तुम्हें पुत्र शोक दिया इस दुख से मुक्त होने के लिए तुम संतान सप्तमी व्रत करो | राजा नहुष की रानी चंद्रमुखी ने भी यह व्रत किया था |

उसके भी पुत्र नहीं मरे यह व्रत तुम्हें भी पुत्र शोक से मुक्त करेगा | देवकी ने पूछा हे ऋषि वर मुझे व्रत का पूरा विधि-विधान बताने की कृपा करें |

संतान सप्तमी व्रत में अयोध्या पुरी का वृत्तांत –

लोमस ऋषि बोले नहुष अयोध्या पुरी का प्रतापी राजा था | वहां विष्णु दत्त नामक ब्राह्मण भी रहता था | उसकी पत्नी का नाम रूपवती था |

चंद्रमुखी तथा रूपवती में परस्पर घनिष्ठ प्रेम था | एक दिन वे दोनों सरयू में स्नान करने गयीं, वहां और भी स्त्रियां स्नान कर रही थी | उन्होंने वहां मंडल बनाकर पार्वती सहित शिव जी की प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक पूजन किया |

उन स्त्रियों से चंद्रमुखी तथा रूपवती ने पूजन का नाम तथा विधि पूछी | स्त्रियों ने बताया कि हमने पार्वती शिव की पूजा की है | भगवान शिव का डोरा बांध कर हमने संकल्प किया है, कि जब तक जीवित रहेंगे तब तक यह व्रत करती रहेंगे |

यह मुक्ता भरण व्रत सुख तथा संतान देने वाला है | स्त्रियों की बात सुनकर उन दोनों ने भी जीवन पर्यंत इस व्रत को करने का संकल्प करके, शिव जी के नाम का डोरा बांध लिया | किंतु घर पहुंचने पर वे संकल्प को भूल गयीं |

संतान सप्तमी व्रत में दूसरे जन्म की कथा

फलतः मृत्यु के पश्चात रानी बांदरी तथा ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुई | कालांतर में पशु योनि छोड़कर मनुष्य योनि में आए | चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी | रूपवती ने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया |

इस जन्म में रानी का ईश्वरी तथा ब्राह्मणी का नाम भूषण रखा गया | भूषण का विवाह राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ | इस जन्म में भी उन दोनों की बड़ी प्रीति थी | व्रत भूलने के कारण रानी इस जन्म में बांझ हुई |

कहीं प्रौढ़ावस्था में जाकर उसको एक गूंगा तथा बहरा पुत्र जन्मा तो सही, पर 9 साल का होकर मर गया | भूषण ने व्रत को याद रखा था, इसलिए उसके गर्व से सुंदर तथा स्वस्थ आठ पुत्रों ने जन्म लिया |

रानी ईश्वरी के पुत्र शोक की संवेदना के लिए एक दिन भूषण उससे मिलने गई | उसे देखते ही रानी के मन में डाह पैदा हुई | उसने भूषण को विदा करके उसके पुत्रों को भोजन के लिए बुलाया और भोजन में विष मिला दिया |

परंतु भूषण के व्रत के प्रभाव से उनका बाल भी बांका ना हुआ | इससे रानी को और भी अधिक क्रोध आया उसने अपने नौकरों को आज्ञा दी कि भूषण के पुत्रों को पूजा के बहाने यमुना के किनारे ले जाकर गहरे जल में ढकेल दो |

भूषण के बालक व्रत के प्रभाव से इस बार भी बच गए | परिणामतः रानी ने जल्लादों को बुलाकर आज्ञा दी कि ब्राह्मण बालकों को वध स्थल पर ले जाकर मार डालो | जल्लादों का बेहद प्रयास करने पर भी बालक मर ना सके |

यह समाचार सुनकर रानी को आश्चर्य हुआ | उसने भूषण को बुलाकर पूछा कि किस कारण उसके बच्चे नहीं मर पाए हैं |

कराया पूर्व जन्म का स्मरण

तब भूषण बोली आपको क्या पूर्व जन्म की बात स्मरण नहीं है | रानी बोली क्यों मुझे तो कुछ याद नहीं है | तब उसने कहा सुनो पूर्व जन्म में तुम राजा नहुष की रानी थी, और मैं तुम्हारी सखी हम दोनों ने एक बार भगवान शिव का डोरा बांधकर संकल्प किया था |

कि जीवन पर्यंत संतान सप्तमी व्रत को किया करेंगे | किंतु दुर्भाग्यवश हम भूल गए तो व्रत की अवहेलना होने के कारण विभिन्न योनियों में जन्म लेती हुई, अब फिर इस मनुष्य जन्म को प्राप्त हुई है |

अब मुझे उस वृत्त की याद हो आई थी तो मैंने व्रत किया | उसी के प्रभाव से मेरे पुत्रों को आप चाहे कर भी ना मरवा सकीं | यह सब सुनकर रानी ईश्वरी ने भी विधिपूर्वक यह संतान सुख देने वाला मुक्ता भरण व्रत रखा |

तब व्रत के प्रभाव से रानी पुनः गर्भवती हुई और एक सुंदर बालक उत्पन्न हुआ | इसी समय से पुत्र प्राप्ति और संतान की रक्षा के निमित्त इस व्रत का अत्यधिक प्रचलन हुआ |

किसी भी व्रत को विधि विधान के साथ तथा श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए | व्रत आस्था का विषय हैं आस्थावान लभते ज्ञानम् ||

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