तीजपर्व के विविध रूप (hariyali teej)

hariyali teej श्रावणशुक्ल तृतीया (तीज) को कजली तीज का पर्व मनाया जाता है

समस्त उत्तर भारत में hariyali teej तीजपर्व बडे उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। इसे श्रावणी तीज, हरयाली तीज तथा कजली तीजके नाम से भी जाना जाता है। बुंदेलखण्ड के जालौन, झाँसी, दतिया, महोबा, ओरछा आदि क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव रूप में मनाते हैं। प्रातःकाल उद्यानों से आम- अशोक के पत्तों सहित टहनियाँ, पुष्पगुच्छ लाकर घरों में पूजास्थान के पास स्थापित झूलेको इनसे सजाते हैं और दिन भर उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण्के श्रीविग्रह को झूले में रखकर श्रद्धा से झुलाते हैं, साथ में लोकगीतों को मधुर स्वर में गाते हैं।

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कहाँ और कैसे मनाते हैं

ओरछ, दतिया और चरखारीका तीजपर्व श्रीकृष्ण के दोलारोहण के रूप में वृंदावन जैसा दिव्य दृश्य उत्पन्न कर देता है। वनारस जौनपुर आदि पूर्वांचल के जनपदों में तीजपर्व (कजली तीज) ललनाओं के कजली गीतों से गुंजायमान होकर आद्भुत आनंद देता है। प्रायः विवाहिता नवयुवतियाँ श्रावणी तीज को अपने मातृगृहों ( पीहर ) में अपने भाइयों के साथ पहुँचतीं हैं, जहाँ अपनी सखी सहेलियों के साथ नववस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर सायंकाल सरोवर तट के समीप उद्द्यानों में झूला झूलते हुए कजली तीज के गीत गातीं हैं।

धूमधाम से मानते है hariyali teej

राजस्थान में तीजपर्व ऋतूत्सव के रूप में सानंद मनाया जाता है। सावन में सुरम्य हरियाली को पाकर तथा मेघ घटाओं को देखकर लोकजीवन हर्षोल्लाससे यह पर्व हिलमिलकर मनाता है। आसमान में घुमडती काली घटाओं के कारण इस पर्व को कजली तीज ( कज्जली तीज ) अथवा हरियाली के कारण हरियाली तीज के नाम से पुकारते हैं।

श्रावण शुक्ल तृतीया को बालिकायें एवं नवविवाहिता वधुएँ इस पर्व को मनाने के लिए एक दिन पूर्व से अपने हाँथों तथा पैरों में कलात्मक ढंग से मेंहँदी लगातीं हैं। जिसे ‘मेहँदी- माँड्णा’ के नाम से जाना जाता है। दूसरे दिन वे प्रसन्न्ता से अपने पिता के घर जातीं हैं, जहाँ उन्हें नयी पोशाकें गहने आदि दिए जाते हैं तथा भोजन- पकवान आदि से तृप्त किया जाता है।

राजस्थानी लोकगीतोंसे पता चलता है कि नवविवाहिता पत्नि दूर देश गये अपने पति की तीजपर्व पर घर आने की कामना करती है।

तीजपर्व सम्बंधी अन्य लोकगीतों में नरीमन की मार्मिक मनोभावना इस प्रकार सुंदर रूप में ब्यक्त हुई –

सावोणी री कजली तीज,  साजन प्यारा पावणां जी।

                              नीमडली…….॥

साहिवा जी हिवडा न आस घडाय

दलडी तो महगां मोल की जी ।

                             नीमडली……….॥

इसी प्रकार कजलेतीज पर कुलकामिनी की कामना निम्नलिखित लोकगीतों में इस रूप में ब्यक्त हुई

मारा माथान मेमद लाय, मारा अनजा मारू यही ही रहो जी।

यहीं ही रहो जी, लखपतिया ढोला यहीं ही रहो जी ।।

इस तीज त्यौहार के अवसर पर राजस्थान में झूले लगते हैं। और नदियों या सरोवरों के तटों पर मेलों का सुंदर आयोजन होता है। इस त्यौहार के आस पास खेतों में खरीफ फसलों की बुआई भी शुरु हो जाती है।

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