रविवार व्रत कथा (ravivar vrat katha)

रोग निवारक रविवार व्रत कथा (ravivar vrat katha)

पिछले लेख में हमने ” व्रत उपवास से अनंत पुण्य और आरोग्य की प्राप्ति  ” इस बारे में संक्षेप में चर्चा की इस  लेख में ” भगवान सूर्य नारायण के ravivar vrat katha के बारे में ”  संक्षेप में चर्चा करेंगे

रविवार को किये जाने वाला सूर्य व्रत रोगों के निवारण  आयुवृद्धि,  कामनाओं की सिद्धि, तथा सूर्य नारायण की प्रसन्नता के लिए रविवार का व्रत (ravivar vrat katha) करना चाहिए |

विधि – तांबे के पात्र में रक्त चन्दन से अष्टदल कमल बनाकर उस पर सूर्य भगवान का पूजन करना चाहिए |

ध्यान – हे सूर्य भगवान आइये मंडल पर स्थिर हो जाएँ जब तक पूजा पूरी हो तब तक आप सन्निधि दें

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ravivar vrat katha व्रत कथा

प्राचीन काल में एक नगर में एक धार्मिक वृद्धा रहती थी। वो प्रत्येक रविवार को सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती थी। उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती थी। भगवान सूर्यदेव की कृपा से उन्हें किसी प्रकार की चिन्ता व कष्ट नहीं था।

धीरे-धीरे उनका घर धन-धान्य से भरा रहने लगा | उन वृद्धा को सुखी होते देख उनकी पड़ोसन उनसे बुरी तरह जलने लगी। वृद्धा के पास कोई गाय नहीं थी | इसलिए रविवार के दिन घर लीपने के लिए वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से वृद्धा अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस वृद्धा ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर वृद्धा भूखी-प्यासी ही सो गई।

भगवान ने दिए स्वप्न में दर्शन

इस प्रकार उन्होंने निराहर व्रत किया। रात्रि में सूर्य भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा । अम्मा ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपने भक्त की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा हे माता हम तुमको एक ऐसी गाय देते हैं जो सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। क्योंकि तुम हमेशा रविवार को पूरा घर गाय के गोबर से लीपकर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती हो। इससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। स्वप्न में माताराम को ऐसा वरदान देकर भगवान सूर्य अंतर्ध्यान हो गए।

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस वृद्ध माताराम की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस वृद्धा के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उनसे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फटीं की फटीं रह गई । पड़ोसन ने उस वृद्धा को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और माताराम के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

व्रत का चमत्कार

बहुत दिनों तक माताराम को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। माताराम पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर माताराम ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर माताराम ने सोने का गोबर देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद माताराम गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से माताराम कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। माताराम के धनी होने से पड़ोसन और ज्यादा जलने लगी |

जब उसे सोने का गोबर पाने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह राजा के दरबार में पहुंची और राजा को सारी बात बताई । राजा को जब वृद्धा के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर वृद्धा की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक वृद्धा के घर पहुंचे। उस समय माताराम सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय खोली और अपने साथ महल की ओर ले चले। माताराम ने सैनिकों से गाय को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्लाई लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय के चले जाने से माताराम को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उनने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय को पुन: प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करने लगी।

सूर्य dev ने दिया सपना

दूसरी ओर राजा गाय को देखकर बहुत खुश हुआ। लेकिन अगले दिन सुबह जैसे ही वह उठा सारा महल गोबर से भरा देखकर घबरा गया। उसी रात भगवान सूर्य उसके सपने में आए और बोले- हे राजन, यह गाय वृद्धा को लौटाने में ही तुम्हारा भला है। रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर ही उसे यह गाय मैंने दी है।

सुबह होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान सहित गाय लौटा दी और क्षमा मांगी। इसके बाद राजा ने पड़ोसन को दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से सारा गोबर अपने आप साफ हो गया । उसी दिन रजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए।

इस लेख में भगवान सूर्य नारायण के रविवार व्रत (ravivar vrat katha) के बारे में संक्षिप्त में चर्चा की अगले लेख में भूतभावन भगवान भोले नाथ का सोमवार के व्रत के वारे में चर्चा करेंगे 

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