upvas ke niyam

व्रत क्या है ?

व्रत क्या है, उपवास के नियम क्या हैं ? उपवास का अर्थ क्या है ? केवल भूखे रहने को ही व्रत नहीं कहते यदि भूखे रहने को व्रत कहते तो जिन व्यक्तियों को अपनी अकर्मंडयता के कारण भोजन प्राप्त नहीं होता वही सबसे अच्छे व्रती कहलाने लगते | व्रत का असली अर्थ है व्रताचरण अर्थात व्रत के अनुरूप आचरण करना | इस लेख में व्रतों के भेद, व्रत का अर्थ आदि के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त होगी |

vrat upvas ke niyam

व्रत और उपवास

व्रताचरण से मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता प्राप्त होती है उपवास के नियम में तीन बातो की प्रधानता है | 1 – संयम – नियम का पालन | 2  – देव आराधना तथा  3 – लक्ष्य के प्रति जागरूकता | व्रतों से अंत:करण की शुद्धि के साथ -साथ वाह्य वातावरण में भी पवित्रता आती है तथा संकल्प शक्ति में दृढ़ता आती है | इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वर  की भक्ति भी प्राप्त होती है | भौतिक दृष्टि से स्वास्थ में भी लाभ होता है | अर्थात रोगो की निवृत्ति होती है | यद्द्पि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होती हैं | तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकार के पाप, उपपाप और महापापादि  भी व्रतों से ही दूर होते हैं |

यदि आप साधना करते हैं तो इसे अवश्य पढ़ें 

व्रतों के भेद

व्रत दो प्रकार से किये जाते हैं  1- उपवास अर्थात निराहार रहकर और  2 – एक बार संयमित आहार के द्वारा | इन व्रतों के कई भेद हैं  – 1 – कायिक – हिंसा आदि के त्याग को कायिक व्रत कहते हैं |  2 – वाचिक – कटुवाणी, पिशुनता (चुगली ) तथा निंदा का त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त  मधुर भाषण ‘वाचिकवृत ‘ कहा जाता है |  3  – मानसिक – काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदि से रहित रहना ‘मानशिक’ व्रत है |

मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकार के व्रत माने गए हैं – 1  – नित्य,  2  – नैमित्तिक और  3 – काम्य | नित्य वे व्रत हैं जो भक्तिपूर्वक भगवान की प्रसन्नता के लिए निरंतर कर्तब्य भाव स किये जाते हैं | एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा आदि व्रत इसी प्रकार के हैं | किसी निमित्त से जो व्रत किये जाते हैं वे  नैमित्तिक व्रत कहलाते हैं | पापक्षय के निमित्त चांद्रायण, प्रजापत्य आदि व्रत इसी कोटि में हैं | किसी कामनाओं को लेकर जो व्रत किये जाते हैं वे काम्यव्रत कहे जाते हैं | कन्याओ द्वारा वर प्राप्ति के लिए किये गए गौरीव्रत, वटसावित्री व्रत आदि काम्यव्रत हैं | इसके अतिरिक्त व्रतों के एकभुक्त, अयाचित तथा मितभुक और नक्तव्रत आदि कई भेद हैं |

व्रत का अर्थ

व्रत का आध्यात्मिक अर्थ उन आचरणों से है जो शुद्ध, सरल और सात्विक हों तथा उनका विशेष मनोयोग तथा निष्ठापूर्वक पालन किया जाय | कुछ लोग व्यावहारिक जीवन में सत्य बोलने का प्रयास करते हैं और सत्य का आचरण भी करते हैं, परन्तु कभी- कभी उनके जीवन में कुछ ऐसे क्षण आ जाते हैं की लोभ और स्वार्थ के वशीभूत होकर उन्हें असत्य का आश्रय लेना पड़ता है तथा वे उन क्षणों में झूठ भी बोल जाते हैं | अतः आचरण की शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना व्रत है | प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रसन्न रहकर जीवन ब्यतीत करने का अभ्यास ही व्रत है | इससे मनुष्य में श्रेष्ठ कर्मो की सम्पादन की योग्यता आती है, कठिनाइयो में आगे बढ़ने की शक्ति प्राप्त होती है, आत्मविश्वास दृढ़ होता है और अनुसाशन की भावना विकसित होती है |

आत्मज्ञान के महान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भिक कक्षा व्रत पालन ही है | इसी से हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं | व्रताचरण से मानव महान बनाता है | इसी व्रताचरण से हमारे ऋषि मुनि इतने महान हुए जिनकी गाथा गाते आज हम थकते नहीं हैं | उन्हीं ऋषियों की दें है की आज हम इतने विकाश की ओर अग्रसर हैं | उन्हीं ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से इस खगोल का वृस्तित वर्णन किया जिसे हम ज्योतिष शास्त्र के नाम से जानते हैं | अच्छी दृष्टि से देखा जाय तो आज हमारे पास जो है वह हमारे ऋषियों की धरोहर है | हम उन ऋषियों के सदा ऋणी रहेंगे | हमारे भारत भूमि में जन्मे ऐसे परोपकारी संतों को कोटि-कोटि प्रणाम करते हैं |

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व्रत उपवासव्रतों के भेदव्रत का अर्थ

इस लेख में व्रत उपवास,  व्रतों के भेद,  व्रत का अर्थ आदि के बारे में संक्षिप्त में चर्चा हुई अगले लेख में व्रतों के कुछ और भेद के बारे में चर्चा करेंगे | जैसे – 1 –  दिव्यपर्व  2 – देवपर्व  3 – पितृपर्व  4 – कालपर्व  5 – जयन्तीपर्व  6 – प्राणिपर्व  7 – वनस्पतिपर्व  8 – मानवपर्व  9 – तीर्थपर्व इन उपर्युक्त पर्वों के बारे में अगले लेख में कुछ विस्तार से चर्चा करेंगे |

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