वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जन्मकुंडली का तीसरा भाव पराक्रम, छोटे भाई-बहन और साहस का स्थान माना जाता है। जब चंद्रमा जन्मकुंडली के तीसरे भाव (moon in 3rd house) में स्थित होता है, तो यह व्यक्ति के स्वभाव, संबंधों और जीवन में संघर्ष एवं सफलता को किस प्रकार प्रभावित करता है, आइए इसका विस्तृत विश्लेषण करते हैं।
तृतीय भाव में स्थित चंद्रमा का फलादेश
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चंद्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। ऐसे जातकों को अपने छोटे भाई-बहनों या उनके तुल्य व्यक्तियों का दायित्व एवं भार उठाना पड़ता है। किसी न किसी रूप में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति आपको ही करनी पड़ती है। यदि आप अपनी जन्मकुंडली विश्लेषण करवाते हैं, तो यह स्थिति पारिवारिक उत्तरदायित्वों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
चौथे घर का स्वामी होने के कारण चंद्रमा जातक को भूमि, भवन, वाहन आदि का सुख भी प्रदान करता है। परंतु चतुर्थ भाव से तीसरा भाव बारहवां (व्यय स्थान) होता है, इस कारण इन सुखों की प्राप्ति के लिए आपको अधिक परिश्रम करना पड़ता है तथा अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है।
क्योंकि चंद्रमा बुध को मित्र मानता है परंतु बुध चंद्रमा को शत्रु मानता है, इसलिए चंद्रमा बुध के घर में बैठकर बहुत उत्तम फल नहीं दे पाता। कभी-कभी ऐसे जातकों को चर्म रोग से पीड़ित भी पाया गया है और पेट दर्द की समस्या भी होते देखी गई है।
नवम भाव पर दृष्टि एवं भाग्योदय
सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि से नवम भाव (भाग्य स्थान) को देखने के कारण जातक का भाग्योदय बहुत ही जल्दी हो जाता है। ऐसे जातकों को अल्प परिश्रम में ही अच्छी सफलता प्राप्त होती है।
ऐसा व्यक्ति धर्मात्मा, उदार, दानी, विद्वान, भाग्यवान तथा अत्यधिक यशस्वी होता है। चंद्र और बुध यदि शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों, तो इस प्रकार के ग्रह योग वाले जातक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनेक प्रकार की सफलताएं प्राप्त करते हैं। मानसिक एकाग्रता और शुभ फल प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष धारण करना भी लाभकारी सिद्ध होता है।
तृतीय भाव में स्थित चंद्र के अचूक उपाय (Moon in 3rd House Remedies)
यदि तृतीय भाव स्थित चंद्रमा के कारण स्वास्थ्य या पारिवारिक जीवन में कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हो, तो निम्नलिखित वैदिक उपायों का पालन करना चाहिए:
- यदि कन्याएं ही प्राप्त हो रही हों, तो कन्या जन्म के बाद सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए।
- बेटी के ससुराल में भोजनादि ग्रहण नहीं करना चाहिए।
- ब्राह्मण भोजन में दूध से बने पकवानों (जैसे खीर) का अधिक उपयोग करना चाहिए।
- नित्य अथवा नियमित रूप से दुर्गा द्वात्रिंशन्नाम माला का पाठ करना चाहिए।
- छोटी कन्याओं को श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
- पुत्र की कामना हेतु कन्याओं के चरण धोकर चरणामृत लेना चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
- वर्ष की चारों नवरात्रियों (प्रकट एवं गुप्त) में व्रत-अनुष्ठान करना चाहिए।


