वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जन्मकुंडली का पंचम भाव बुद्धि, विद्या, संतान, विवेक और धर्म का स्थान माना जाता है। जब चंद्रमा पंचम भाव (moon in 5th house) में विराजमान होता है, तो यह जातक के बौद्धिक स्तर, मानसिक शांति और संतान पक्ष पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
पंचम भाव में चंद्रमा का प्रभाव एवं फलादेश
पांचवें भाव में अपने मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चंद्रमा के प्रभाव से जातक बड़ा विद्वान होता है। ऐसे व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और समाज में यथोचित सम्मान प्राप्त करते हैं।
ऐसे व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान एवं संततिवान होते हैं। इनकी संतान तो होती है, किन्तु संतान अधिक खर्चीले स्वभाव की होती है। यदि पंचम भाव पर किसी पाप ग्रह की दृष्टि पड़ती है तो व्यक्ति संतान से दुखी रहता है। इसके साथ ही, ऐसे जातकों की माता को अनेक प्रकार के कष्ट सहन करने पड़ते हैं। अपनी व्यक्तिगत स्थिति जानने के लिए जन्मकुंडली विश्लेषण अवश्य करवाएं।
आय के साधन, करियर एवं ग्रह योग
पंचम भाव में स्थित चंद्रमा अपनी सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि वाले ग्यारहवें भाव (लाभ स्थान) को देखता है। इस दृष्टि के कारण जातक को आय के साधनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परंतु वह अपने धैर्य एवं शांत स्वभाव से इन सभी समस्याओं को हल कर लेता है।
सामान्यतः ऐसी ग्रह स्थिति का व्यक्ति धीर, गंभीर, शांत, योग्य, विद्वान, संतोषी, माता से सुखी तथा भू-संपत्ति का स्वामी होता है। किन्तु ऐसे जातकों को व्यवसाय एवं लाभ के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी परिस्थितियोंवश ऐसे व्यक्तियों को कर्ज भी लेना पड़ता है।
जिस व्यक्ति का पंचमेश सूर्य शुभ राशि में अथवा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो जातक कुशाग्र बुद्धि वाला, वेद-शास्त्रों को जानने वाला और धार्मिक प्रवृत्ति का तीर्थ सेवी होता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु सिद्ध यंत्र धारण करना लाभप्रद रहता है।
पंचम भाव में स्थित चंद्रमा के अचूक उपाय
यदि पंचम भाव में चंद्रमा के कारण आय, संतान या व्यापार में किसी प्रकार की बाधा आ रही हो, तो निम्नलिखित उपायों का पालन करें:
- अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए कभी भी किसी अन्य व्यक्ति का नुकसान न करें।
- किसी भी कार्य को दूसरों के दबाव में न करके अपने विवेक से संपन्न करें।
- दूसरे व्यक्ति की सलाह पर काम करने से पहले अच्छी तरह से मनन करें, उसके बाद ही कार्य आरम्भ करें।
- अपनी वाणी पर सदा नियंत्रण रखें। कोशिश करें कि किसी को भी दुःख पहुँचाने वाली भाषा का उपयोग न हो।
- बुजुर्ग, ब्राह्मण और अपने से बड़े लोगों की निष्ठापूर्वक सेवा करें। इससे आपकी आय एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।
- संतान सुख, उन्नति तथा उत्तम आरोग्य के लिए नियमित रूप से आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।


