संतोषी माता व्रत कथा (santoshi mata vrat katha) हिंदू धर्म में अत्यंत लोकप्रिय और चमत्कारी व्रतों में से एक मानी जाती है। विशेष रूप से शुक्रवार व्रत (Friday vrat) के दिन किया जाने वाला यह व्रत माँ संतोषी की कृपा प्राप्त करने का सरल और प्रभावशाली उपाय है।
इस व्रत को करने से घर में सुख-शांति, धन-समृद्धि, संतान सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो दुर्भाग्य, गरीबी, पारिवारिक क्लेश या आर्थिक संकट से परेशान हैं।
- santoshi mata vrat katha (सम्पूर्ण कथा)
- santoshi mata vrat vidhi (पूजन विधि)
- santoshi mata vrat ke fayde (लाभ)
- उद्यापन विधि और नियम
संतोषी माता व्रत कथा के अनेक फायदे
शुक्रवार व्रत कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ व भुने चने रखें। कथा सुनाने वाले को चाहिए कि वह संतोषी माता का नाम जप करता रहे। कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड़-चना गौ माता को खिलाएं और कलश में रखा हुआ गुड़-चना सबको प्रसाद के रूप में बांट दें।
संतोषी माता व्रत पूजन विधि (Santoshi Mata Vrat Vidhi)
सबसे पहले कलश को जल से भरें। उसके ऊपर गुड़-चना से भरा हुआ कटोरा रखें। कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगह छिड़कें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाल दें।
संतोषी माता व्रत का उद्यापन (Santoshi Mata Vrat Udyapan)
उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा, मोमनादर पूरी, खीर, चने का साग, नैवेद्य रखें। घी का दीपक जलाकर संतोषी माता का जयकारा बोलते हुए नारियल फोड़ें। इस दिन घर में कोई खटाई न खाए—न आप खाएं, न किसी दूसरे को खाने दें।
इस दिन आठ लड़कों को भोजन कराएं। घर-कुटुंब के लड़के हों तो दूसरे को नहीं बुलाना चाहिए। कुटुंब में न मिलें तो ब्राह्मणों के, रिश्तेदारों के या पड़ोसियों के लड़के बुलाएं। उन्हें खटाई की कोई वस्तु न दें तथा भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दें।
अथ शुक्रवार व्रत कथा (Santoshi Mata Vrat Katha)
एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छह कमाने वाले थे, एक निकम्मा था। बुढ़िया माँ छह पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो कुछ बचता सो सातवें को दे देती थी। परन्तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन में कुछ विचार न करता था।
एक दिन अपनी बहू से बोला– "देखो! मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है।" वह बोली– "क्यों नहीं, सबका झूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है।" वह बोला– "भला ऐसा भी कहीं हो सकता है! मैं जब तक आँखों से न देखूँ मान नहीं सकता।" बहू ने हंसकर कहा– "तुम देख लोगे तब तो मानोगे।"
कुछ दिन बाद बड़ा त्योहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने। सातवाँ पुत्र यह जाँचने को सिर दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई घर में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आये, उसने देखा माँ ने उनके लिए सुंदर-सुंदर आसन बिछाए हैं, सात प्रकार की रसोई परोसी है और आग्रह करके जिमाती है।
छहों भाई भोजन कर उठे तब माता ने उनकी झूठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ़ कर बुढ़िया माँ ने पुकारा– "उठो बेटा! छहों भाई भोजन कर गए, अब तुम ही बाकी हो, उठो न, कब खाओगे?" वह कहने लगा– "माँ मुझे भोजन नहीं करना, मैं परदेश जा रहा हूँ।" माता ने कहा– "कल जाता हो तो आज ही जा।" वह बोला– "हाँ-हाँ, आज ही जा रहा हूँ।" यह कहकर वह घर से निकल गया।
चलते समय बहू की याद आई। वह गौशाला में उपले थाप रही थी, वहीं जाकर उससे बोला–
हम जावें परदेश को, आवें के कुछ काल।
तुम रहियो संतोष से, धरम आपनो पाल॥
वह बोली–
जाओ पिया आनंद से, हमरो सोच हटाय।
राम भरोसे हम रहे, ईश्वर तुम्हें सहाय॥
देख निशानी आपकी, देख धरूँ मैं धीर।
सुध हमारी मति बिसरियो, रखियो मन गंभीर॥
वह बोला– "मेरे पास तो कुछ नहीं है, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे।" वह बोली– "मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है।" यह कहकर उसने उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया और चलते-चलते दूर देश में पहुँचा।
वहाँ पर एक साहूकार की दुकान थी। वहाँ जाकर कहने लगा– "भाई! मुझे नौकरी पर रख लो।" साहूकार को ज़रूरत थी, बोला– "रह जा।" लड़के ने पूछा– "तनख्वाह क्या दोगे?" साहूकार ने कहा– "काम देखकर दाम मिलेंगे।"
साहूकार के यहाँ नौकरी मिल गई। वह सबेरे सात बजे से रात तक नौकरी बजाने लगा। कुछ ही दिनों में दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा। साहूकार के 7-8 नौकर थे, वे सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में उसे आधे मुनाफे का साझेदार बना लिया। वह 12 वर्ष में ही नामी सेठ बन गया।
अब बहू पर क्या बीती सो सुनो। सास-ससुर उसे दुःख देने लगे। सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर की रोटियों में आटा छानते वक्त जो भूसी निकलती, उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल के खोपरे में पानी। इस तरह दिन बीतते रहे।
एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। वह खड़ी होकर कथा सुनकर बोली– "बहिनों! यह तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने से क्या फल मिलता है? इस व्रत की क्या विधि है? यदि तुम अपने व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा अहसान मानूँगी।"
तब उनमें से एक स्त्री बोली– "सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता और दरिद्रता का नाश होता है तथा लक्ष्मी आती है। मन की चिंताएं दूर होती हैं। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है। निपुत्र को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो जल्दी आता है। कुंवारी कन्या को मनपसंद वर मिलता है। राजद्वार में मुक़दमा चलता हो तो समाप्त हो जाता है। सब तरह से सुख-शांति होती है, रोग दूर होते हैं तथा मन में जो भी कामना हो, वह सब संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जाती है।"
वह पूछने लगी– "यह व्रत कैसे किया जाए, यह भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी।"
स्त्री कहने लगी– "सवा रुपये का गुड़-चना लेना, इच्छा हो तो सवा पाँच रुपये या सवा ग्यारह रुपये का सामर्थ्य अनुसार लेना। हर शुक्रवार को निराहार रहकर कथा कहना-सुनना। इसके बीच क्रम टूटे नहीं। सुनाने वाला कोई न मिले तो दीपक जलाकर उसके आगे जल का पात्र रखकर कथा कहना, परन्तु नियम न टूटे। जब तक कार्य सिद्ध न हो, नियम पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर ही उद्यापन करना। तीन मास में माता फल पूरा करती हैं। यदि किसी के ग्रह खराब हों तो भी माता एक वर्ष में अवश्य कार्य सिद्ध करती हैं।"
यह सुनकर बुढ़िया के लड़के की बहू चल दी। रास्ते में लकड़ी का बोझ बेच दिया और उन पैसों से गुड़-चना लेकर व्रत की तैयारी की। आगे सामने मंदिर देखकर पूछने लगी– "यह मंदिर किसका है?" सब कहने लगे– "संतोषी माता का मंदिर है।" यह सुनकर वह माता के मंदिर में जाकर चरणों में लोटने लगी और दीन होकर विनती करने लगी– "माँ! मैं निपट मूर्ख हूँ। हे माता जगत जननी! मेरा दुःख दूर कर, मैं तेरी शरण में हूँ।"
माता को दया आई। एक शुक्रवार बीता कि दूसरे शुक्रवार को ही उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा भी आ पहुँचा। यह देखकर जेठानी मुँह सिकोड़ने लगी– "इतने दिनों में पैसा आया, इसमें क्या बड़ाई है?" लड़के ताने देने लगे। बेचारी सरलता से कहती– "भैया! पत्र आवे, रुपया आवे तो हम सबके लिए अच्छा है।"
ऐसा कहकर आँखों में आँसू भरकर वह संतोषी माता के मंदिर में जाकर चरणों में गिरकर रोने लगी– "माँ! मैंने तुझसे पैसा नहीं माँगा, मुझे पैसे से क्या काम? मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा माँगती हूँ।" तब माता ने प्रसन्न होकर कहा– "जा बेटी, तेरा स्वामी आएगा।" यह सुनकर खुशी से बावली होकर वह घर जाकर काम करने लगी।
अब संतोषी माँ विचार करने लगीं– "इस भोली पुत्री से मैंने कह तो दिया कि तेरा पति आएगा, पर आएगा कहाँ से? वह तो स्वप्न में भी इसे याद नहीं करता। उसे याद दिलाने मुझे जाना पड़ेगा।" इस तरह माता बुढ़िया के बेटे के पास जाकर स्वप्न में प्रकट हुईं और कहने लगीं– "साहूकार के बेटे! सोता है या जागता है?" वह बोला– "माता! सोता भी नहीं हूँ, जागता भी नहीं हूँ, बीच में ही हूँ। कहो क्या आज्ञा है?" माँ कहने लगीं– "तेरा घर-बार कुछ है या नहीं?" वह बोला– "मेरा सब कुछ है माता! माँ-बाप, भाई-बहन, बहू, क्या कमी है?" माँ बोलीं– "भोले पुत्र! तेरी स्त्री घोर कष्ट उठा रही है। माँ-बाप उसे दुःख दे रहे हैं, वह तेरे लिए तरस रही है, तू उसकी सुधि ले।"
वह बोला– "हाँ माता, यह तो मुझे मालूम है परन्तु मैं जाऊँ तो जाऊँ कैसे? परदेश की बात है, लेन-देन का हिसाब बाकी है, जाने का रास्ता नजर नहीं आता।" माँ कहने लगीं– "मेरी बात मान, सबेरे नहा-धोकर संतोषी माता का नाम ले, घी का दीपक जला, दंडवत कर दुकान में जा बैठना। देखते-देखते तेरा लेन-देन सब चुक जाएगा, जमा माल बिक जाएगा, सांझ होते-होते धन का ढेर लग जाएगा।"
सबेरे उठकर उसने लोगों से अपने सपने की बात कही तो सब दिल्लगी उड़ाने लगे। एक बूढ़ा बोला– "देख भाई! मेरी बात मान, देवता ने जैसा कहा है वैसा ही कर।" उसने बूढ़े की बात मान ली। थोड़ी देर में वह क्या देखता है कि देने वाले रुपया देने लगे, लेने वाले हिसाब लेने लगे। शाम तक धन का ढेर लग गया। माता का चमत्कार देख प्रसन्न होकर उसने गहना-कपड़ा खरीदा और घर को रवाना हुआ।
वहाँ बहू जंगल से लकड़ी लेकर लौटते वक्त रोजाना माता के मंदिर में विश्राम करती थी। दूर से धूल उड़ती देख उसने माता से पूछा– "हे माता! यह धूल कैसी उड़ रही है?" माँ कहती हैं– "हे पुत्री! तेरा पति आ रहा है। अब तू लकड़ियों के तीन बोझ बना ले—एक नदी के किनारे रख, दूसरा मेरे मंदिर में, और तीसरा अपने सिर पर रख। तेरे पति को लकड़ी का गट्ठा देखकर मोह पैदा होगा, वह वहाँ रुकेगा और नाश्ता बनाकर खाएगा।"
बहू लकड़ियों के तीन गट्ठे ले आई। मुसाफिर (पति) ने सूखी लकड़ी देखकर भोजन बनाया और खाकर गाँव गया। सब से प्रेम से मिला। उसी समय बहू सिर पर लकड़ी का गट्ठा लिए आई और आँगन में भारी बोझ डालकर जोर से आवाज दी– "लो सासूजी! लकड़ी का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खोपरे में पानी दो, आज कौन मेहमान आया है?"
यह सुनकर सास बाहर आकर कहने लगी– "बहू! ऐसा क्यों कहती है? तेरा मालिक ही आया है। आ बैठ, मीठा भात खा, वस्त्र-गहने पहन।" इतने में पति बाहर आया और अंगूठी देखकर व्याकुल होकर माँ से पूछा– "माँ! यह कौन है?" माँ ने कहा– "बेटा! यह तेरी बहू है। जब से तू गया है तब से सारे गाँव में भटकती फिरती है, काम-काज कुछ करती नहीं।"
वह लज्जित होकर बोला– "ठीक है माँ! मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी देखा है। अब मुझे दूसरे घर की ताली दो तो उसमें रहूँ।" ताली लेकर उसने तीसरी मंजिल के ऊपर कमरे में अपना सामान जमाया। एक ही दिन में राजा के महल जैसा ठाट-बाट बन गया और वे दोनों सुखपूर्वक रहने लगे।
इतने में अगला शुक्रवार आया। बहू ने पति से कहा– "मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है।" पति ने कहा– "बहुत अच्छा, खुशी से करो।" वह तुरंत तैयारी करने लगी। जेठ के लड़कों को भोजन के लिए बुलावा दिया। जेठानी ने अपने बच्चों को सिखा दिया– "देखो रे! भोजन के समय सब लोग खटाई माँगना, जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो सके।"
लड़कों ने पेट भरकर खीर खाई, फिर कहने लगे– "हमें कुछ खटाई दो, खीर खाना हमें भाता नहीं।" बहू ने कहा– "खटाई किसी को नहीं दी जाएगी, यह संतोषी माता का प्रसाद है।" लड़के तुरंत उठ खड़े हुए और बोले– "पैसा लाओ।" भोली बहू ने उन्हें पैसे दे दिए। लड़कों ने जाकर इमली खरीदकर खा ली।
यह देखकर संतोषी माँ ने कोप किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़कर ले गए। जेठ-जेठानी ताने देने लगे। बहू रोती-रोती माता के मंदिर में गई– "हे माता! तुमने यह क्या किया?" माता बोलीं– "पुत्री! तूने उद्यापन में खटाई का नियम भंग किया है।" बहू ने क्षमा माँगी– "माता! मुझे लड़कों ने भूल में डाल दिया, मुझे क्षमा कर दो, अब ऐसी भूल न होगी।" माँ ने कहा– "जा पुत्री! तेरा पति रास्ते में ही आता मिलेगा।" वह घर चली तो राह में पति आता मिला।
कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया। बहू ने पुनः उद्यापन का संकल्प किया। इस बार उसने ब्राह्मणों के लड़कों को बुलाकर भोजन कराया और यथाशक्ति दक्षिणा के साथ फल दिया। इससे संतोषी माता अत्यंत प्रसन्न हुईं।
माता की कृपा से नवें मास उसे चंद्रमा के समान सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। एक दिन संतोषी माता ने स्वयं उसके घर पधारने का विचार किया। माता ने भयानक रूप बनाया—गुड़ और चने से सना मुख, ऊपर सूंड के समान होंठ, उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। देहलीज में पाँव रखते ही सास चिल्लाई– "देखो री! कोई चुड़ैल-डाकिन चली आ रही है, इसे भगाओ!"
छोटी बहू ने रोशनदान से देखकर पहचान लिया और चिल्लाई– "आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं!" उसने किवाड़ खोलकर माता के चरण पकड़ लिए और क्षमा याचना की। माता प्रसन्न हुईं और जैसा फल बहू को दिया वैसा सबको दें।
॥ बोलो संतोषी माता की जय ॥
निष्कर्ष (Conclusion)
संतोषी माता व्रत कथा हमें यह शिक्षा देती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और संतोष से हर समस्या का समाधान संभव है। इस व्रत का मुख्य संदेश है — "संतोष में ही सुख है"।
जो भी भक्त पूरे नियम और श्रद्धा से शुक्रवार व्रत करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ धीरे-धीरे पूर्ण होती हैं। माँ संतोषी की कृपा से आर्थिक समस्या दूर होती है, पारिवारिक कलह समाप्त होता है और विवाह तथा संतान संबंधी समस्याओं का समाधान मिलता है।
श्रद्धा + नियम + संतोष = संतोषी माता की कृपा
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. संतोषी माता व्रत कथा क्या है?
संतोषी माता व्रत कथा एक धार्मिक कथा है जिसमें माँ संतोषी की महिमा और उनके व्रत के प्रभाव का वर्णन किया गया है।
2. संतोषी माता व्रत कैसे करें?
हर शुक्रवार को व्रत रखें, गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाएं, कथा सुनें और खटाई का सेवन न करें।
3. संतोषी माता व्रत के फायदे क्या हैं?
धन की प्राप्ति, विवाह में बाधा दूर होना, संतान सुख, मानसिक शांति और कर्ज से मुक्ति।
4. संतोषी माता व्रत में खटाई क्यों नहीं खाई जाती?
यह व्रत का सबसे महत्वपूर्ण नियम है। खटाई खाने से व्रत भंग हो जाता है और फल नहीं मिलता।
5. संतोषी माता व्रत कितने शुक्रवार करना चाहिए?
आमतौर पर 16 शुक्रवार तक व्रत किया जाता है, लेकिन मनोकामना पूर्ण होने तक भी व्रत जारी रखा जा सकता है।
6. संतोषी माता व्रत उद्यापन कैसे करें?
उद्यापन में 8 बालकों को भोजन कराना चाहिए, खीर, पूरी, चने का साग बनाना चाहिए और खटाई का पूर्ण त्याग करना चाहिए।
7. क्या संतोषी माता व्रत बिना कथा सुने पूरा होता है?
नहीं, कथा सुनना या पढ़ना आवश्यक है। बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है।
8. santoshi mata vrat katha कब पढ़नी चाहिए?
यह कथा हर शुक्रवार व्रत के दिन पूजा के समय पढ़नी या सुननी चाहिए।
9. क्या महिलाएं और पुरुष दोनों यह व्रत कर सकते हैं?
हाँ, यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते हैं।


