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सोमवार व्रत कथा: पायें शिव पार्वती का आशीर्वाद

✍️ pt.rajguru@gmail.com  |  🕒 August 2, 2019  |  ⏱ 0 मिनट पढ़ें

पिछले लेख में भगवान सूर्य नारायण के रविवार के व्रत के बारे में संक्षिप्त में चर्चा की। इस लेख में भूतभावन भगवान भोले नाथ के सोमवार के व्रत (somvar vrat katha) के बारे में चर्चा करेंगे। सोमवार व्रत कथा का पाठ करने और सच्चे मन से भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना करने से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

सोमवार व्रत कथा (Somvar Vrat Katha)

आर्यावर्त में चित्रवर्मा नाम के एक प्रसिद्ध राजा रहते थे। वे दुष्टों को दंड देने के लिए यमराज के समान समझे जाते थे। वे धर्म मर्यादाओं के रक्षक, कुमार्गगामी पुरुषों को दंड देकर राह पर लाने वाले, समस्त प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले और शरणार्थियों की रक्षा करने में समर्थ थे। भगवान शिव और विष्णु में उनकी बड़ी भक्ति थी।

राजा चित्रवर्मा ने अनेक पराक्रमी पुत्रों को पाकर अंत में एक सुन्दर मुख वाली कन्या प्राप्त की। एक दिन राजा ने जातक के लक्षण जानने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर कन्या की जन्म कुंडली के अनुसार भावी फल पूछे, तब उन ब्राह्मणों में से एक बहुत विद्वान ने कहा— "महाराज! यह आपकी कन्या सीमंतिनी नाम से प्रसिद्ध होगी। यह भगवती उमा की भांति मंगलमयी, दमयंती की भांति परम सुंदरी, सरस्वती के समान सब कलाओं को जानने वाली तथा लक्ष्मी की भांति अत्यंत सद्गुणों से सुशोभित होगी।"

ब्राह्मणों की भविष्यवाणी

ब्राह्मण ने आगे कहा— "यह दस हजार वर्षों तक अपने स्वामी के साथ आनंद भोगेगी और आठ पुत्रों को जन्म देकर उत्तम सुख का उपभोग करेगी।" तत्पश्चात एक दूसरे ब्राह्मण ने कहा— "यह कन्या चौदहवें वर्ष में विधवा हो जाएगी।" यह वज्राघात के समान दारुण वचन सुनकर राजा दो घड़ी तक चिंता में डूबे रहे। तदनंतर सब ब्राह्मणों को विदा करके राजा ने सब भाग्य पर छोड़ दिया।

सीमंतिनी धीरे-धीरे सयानी हुई। अपनी सखी के मुख से भावी वैधव्य की बात सुनकर उसे बड़ा खेद हुआ। उसने चिंतामग्न होकर याज्ञवल्क्य मुनि की पत्नी मैत्रेयी से पूछा— "माता जी! मैं आपकी शरण में आई हूँ, मुझे सौभाग्य बढ़ाने वाले सत्कर्म का उपदेश दीजिये।"

इस प्रकार शरण में आई हुई राजकन्या से पतिव्रता मैत्रेयी ने कहा— "सुंदरी! तू शिव सहित पार्वती जी की शरण में जा और सोमवार को एकाग्रचित्त हो स्नान और उपवास पूर्वक स्वच्छ वस्त्र धारण करके शिव और पार्वती की आराधना करती रहो। इससे बड़ी भारी आपत्ति पड़ने पर भी तू उससे मुक्त हो जाएगी। घोर से घोर एवं भयंकर महाक्लेश में पड़कर भी शिव पूजा न छोड़ना, उसके प्रभाव से भव से पार हो जाओगी।"

इस प्रकार सीमंतिनी को आश्वासन देकर पतिव्रता मैत्रेयी आश्रम को चली गयीं। राजकुमारी ने उनके कथनानुसार भगवान शिव का पूजन प्रारंभ किया।

सीमंतिनी का विवाह और दुर्घटना

यहाँ निषध देश में नल की पत्नी दमयंती के गर्भ से इन्द्रसेन नामक पुत्र हुआ था। राजा इन्द्रसेन के पुत्र चंद्रांगद हुए। नृपश्रेष्ठ चित्रवर्मा ने राजकुमार चंद्रांगद को बुलाकर गुरुजनों की आज्ञा से उन्हीं के साथ अपनी पुत्री सीमंतिनी का विवाह कर दिया। उस विवाह में बड़ा उत्सव हुआ। विवाह के पश्चात् चंद्रांगद कुछ काल तक ससुराल में ही रहे।

यमुना में नाव का डूबना

एक दिन राजकुमार यमुना के पार जाने के लिए कुछ मित्रों के साथ नाव पर सवार हुए। भाग्यवश नाव यमुना के भंवर में मल्लाहों सहित डूब गयी। यमुना के तट पर बड़ा ही हाहाकार मच गया। इस दुर्घटना को देखने वाले समस्त सैनिकों के विलाप से सारा आकाश मंडल गूंज उठा। डूबने वालों में से कुछ तो मर गए और कुछ ग्राहों के पेट में चले गए तथा राजकुमार आदि कुछ लोग उस महाजल में अदृश्य हो गए।

यह समाचार सुनकर राजा चित्रवर्मा बड़े ही व्याकुल हुए और यमुना किनारे आकर मूर्छित होकर गिर पड़े। सीमंतिनी ने भी जब यह समाचार सुना तब वह अचेत होकर धरती पर गिर पड़ी। राजा इन्द्रसेन ने अपने पुत्र के डूबने का समाचार पाकर रानियों सहित बहुत दुखी हुए और सुध-बुध खोकर गिर पड़े। तदनंतर बड़े-बूढ़ों के समझाने पर राजा चित्रवर्मा धीरे-धीरे नगर में आये और उन्होंने अपनी पुत्री को धीरज बंधाया।

राजा चित्रवर्मा ने जल में डूबे हुए अपने दामाद का और्ध्वदैहिक कृत्य वहां आये हुए उनके बंधु-बांधवों से करवाया। पतिव्रता सीमंतिनी ने चिता में बैठकर पतिलोक में जाने का विचार किया किन्तु उनके पिता ने स्नेहवश रोक दिया। तब वह विधवा जीवन व्यतीत करने लगी।

विधवा होने पर भी नहीं छोड़ा व्रत

मुनि पत्नी मैत्रेयी ने जिस शुभ सोमवार व्रत का उपदेश दिया था, उसे सदाचार परायणा सीमंतिनी ने विधवा होने पर भी नहीं छोड़ा। इस प्रकार चौदहवें वर्ष की आयु में अत्यंत दारुण दुःख पाकर वह भगवान शिव के चरणारविंदों का चिंतन करने लगी। शिवाजी की आराधना करते-करते उसके तीन वर्ष व्यतीत हो गए। उधर पुत्र शोक से दुखी राजा इन्द्रसेन को बलपूर्वक दबाकर भाइयों ने सारा राज्य छीन लिया और उन्हें पत्नी सहित पकड़कर कारागार में डाल दिया।

यहाँ इन्द्रसेन के पुत्र चंद्रांगद यमुना के जल में डूबने पर नीचे गहराई में उतरने लगे। बहुत नीचे जाने पर उन्होंने नागवधुओं को जलक्रीडा में निमग्न देखा। राजकुमार को देखकर वे भी विस्मित हुई और उन्हें पाताललोक में ले गयीं। वहां चंद्रांगद ने तक्षक नाग के अद्भुत रमणीय नगर में प्रवेश किया और इन्द्रभवन के समान मनोहर एक सुन्दर महल देखा जो बड़े-बड़े रत्नों की प्रकाशमान किरणों से उदीप्त हो रहा था।

नागराज की सभा में राजकुमार

परम बुद्धिमान राजकुमार ने प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। नागराज भी मनोरम राजकुमार को देखकर उन नागिनों से पूछे— "यह कौन है और कहाँ से आया है?" उन्होंने उत्तर दिया— "हमने इसे यमुना जल में देखा और इसके कुल तथा नाम का परिचय न होने के कारण आपके पास ले आये हैं।"

तब तक्षक ने राजकुमार से पूछा— "तुम किसके पुत्र हो? कौन हो? कौन सा तुम्हारा देश है? और यहाँ पर तुम्हारा कैसे आगमन हुआ?" राजपुत्र ने उदारतापूर्वक सारा वृतांत सुनाया। इस प्रकार अत्यंत मनोहर उदारतापूर्ण वचन सुनकर तक्षक ने कहा— "राजकुमार! तुम भय न करो, धैर्य रखो और बताओ तुम सम्पूर्ण देवताओं में किसकी पूजा करते हो?"

राजकुमार ने कहा— "जो सम्पूर्ण देवों के महादेव कहे जाते हैं, उन्हीं विश्वात्मा उमापति भगवान शिवाजी की मैं पूजा करता हूँ। जो विधाता के भी विधाता और तेजों में सर्वोत्कृष्ट हैं।" राजकुमार की यह बात सुनकर तक्षक का चित्त प्रसन्न हो गया। उनके हृदय में महादेव के प्रति नूतन भक्तिभाव का उदय हो आया और वे उनसे इस प्रकार बोले— "हे राजेन्द्र नंदन! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ क्योंकि तुम बालक होकर भी सर्वोत्कृष्ट परात्पर शिवतत्व को जानते हो, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार यहाँ विचरण करो और यथायोग्य सुख भोगों का उपभोग करो।"

नागराज के ऐसा कहने पर राजकुमार हाथ जोड़कर बोले— "नागराज! मैंने समय पर विवाह किया है, मेरी पत्नी उत्तम व्रत 'सोमवार व्रत' का पालन करने वाली और शिवपूजा परायणा है और मैं अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र हूँ। वे सब लोग इस समय मुझे मरा हुआ मानकर महान शोक से घिर गए होंगे। अतः मुझे किसी प्रकार भी यहाँ अधिक समय तक नहीं ठहरना चाहिए। आप कृपा करके मुझे उसी मृत्युलोक में पहुँचा दीजिये।"

नागराज ने कहा— "राजकुमार! तुम मुझे जब-जब याद करोगे तब-तब मैं तुम्हारे सामने प्रगट हो जाऊंगा।" ऐसा कहकर उन्होंने राजकुमार को एक सुन्दर अश्व भेंट किया जो इच्छा के अनुसार चलने वाला था। ढेर सारे रत्न-आभूषण भेंट कर नागराज ने प्रेमपूर्वक विदा किया।

पुनर्मिलन एवं सोमवार व्रत का फल

चंद्रांगद उस घोड़े पर सवार होकर निकले और थोड़ी ही देर में यमुना के जल से बाहर आकर उस दिव्य अश्व पर चढ़े हुए ही नदी के रमणीक तट पर घूमने लगे। इसी समय पतिव्रता सीमंतिनी अपनी सखियों से घिरी हुई यहाँ स्नान करने के लिए आयीं। उसने यमुना के तट पर मनुष्य रूप धारी नागकुमार के साथ भ्रमण करते हुए राजकुमार चंद्रांगद को देखा। दिव्य अश्व पर आरूढ़ हुए अपूर्व आकार वाले उन राजकुमारों को देखकर वह उन्हीं की ओर दृष्टि लगाये खड़ी हो गई। उसे देखकर चंद्रांगद ने भी मन ही मन विचार किया— "जान पड़ता है इसे मैंने पहले कभी देखा है।"

तत्पश्चात वे घोड़े से उतरकर नदी के किनारे आ बैठे और उस सुंदरी को बुलाकर समीप बैठकर पूछा— "तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? और किसकी कन्या हो?" सीमंतिनी लज्जावश कुछ बोल न सकी, तब उसकी सखी ने सब बातें बतायीं— "इसका नाम सीमंतिनी है। यह निषधराज इन्द्रसेन की पुत्रवधू, युवराज चंद्रांगद की रानी तथा महाराज चित्रवर्मा की पुत्री है। दुर्भाग्यवश इसके पति इस महाजल में डूब गये, अत्यंत प्रबल शोक में ही इसने तीन वर्ष व्यतीत किये हैं। आज सोमवार है इसलिए यहाँ यमुनाजी में स्नान करने के लिए आयी है। इसके ससुर का राज्य भी शत्रुओं ने छीन लिया है और वे महाराज अपनी पत्नी के साथ उनकी कैद में पड़े हैं।"

अंगचिन्हों से पहचान और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति

उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीमंतिनी ने अपनी सखी के मुख से सब बातें कहलवाकर स्वयं भी राजकुमार से पूछा— "आप कौन हैं? और ये दोनों पुरुष कौन हैं? महाबाहो! मुझे ऐसा जान पड़ता है कि पहले मैंने कभी आपको देखा है।"

तदनंतर सीमंतिनी राजकुमार की ओर बारम्बार निहारने लगीं। उसने पहले देखे हुए अंगचिन्हों, स्वर आदि लक्षणों, अवस्था के प्रमाण तथा रूप-रंग आदि की परीक्षा करके यह निश्चय किया कि अवश्य यही मेरे पति हैं, क्योंकि मेरा हृदय प्रेम से अधीर होकर इन्हीं में अनुरक्त हुआ है। परन्तु क्या मुझ अभागिनी को अपने मरे हुए पति का दर्शन हो सकता है? यह स्वप्न है या भ्रम? अथवा मुनि पत्नी मैत्रेयी ने जो मुझसे यह कहा था कि तुम भारी से भारी विपत्ति में पड़ने पर भी इस व्रत का पालन करते रहना, उसी का तो यह फल नहीं है? उन ब्राह्मण देवता का यह वचन अवश्य सत्य होगा। यह ईश्वर के बिना शिव को कौन जान सकता है! इधर प्रतिदिन मुझे मंगलसूचक शुभ शकुन दिखाई देते हैं। पार्वती देवी के प्राणनाथ भगवान शिव के प्रसन्न होने पर देहधारियों के लिए कौन सी वस्तु दुर्लभ है!

इस प्रकार भांति-भांति के विचार करके उसका संदेह दूर हो गया। नागकुमारों से सूचना पाकर राजा इन्द्रसेन हर्ष से विह्वल हो गए। उन्होंने अपने मन ही मन यही माना कि मेरी पुत्रवधू ने भगवान महेश्वर की आराधना करके इस अनुपम सौभाग्य का अर्जन किया है। निषधराज ने यह मंगलमयी वार्ता दूतों के द्वारा महाराज चित्रवर्मा को भी कहला दी। यह अमृतमयी वार्ता सुनकर महाराज चित्रवर्मा आनंद से विह्वल हो गए और संदेशवाहकों को ढेर सारे उपहार दिए। फिर अपनी पुत्री को बुलाकर उन्होंने उससे वैधव्य के चिन्हों का परित्याग करवाया और उसे नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया। तत्पश्चात बड़ा भारी उत्सव हुआ, सब लोगों ने राजकुमारी सीमंतिनी के सदाचार की बड़ी प्रशंसा की।

चित्रवर्मा ने इन्द्रसेन के पुत्र चंद्रांगद को बुलाकर सीमंतिनी को उनके साथ विदा कर दिया। चंद्रांगद ने तक्षक के घर से लाये हुए रत्न आदि आभूषण दिए जो मानव मात्र के लिए अत्यंत दुर्लभ हैं। इस प्रकार शुभ मुहूर्त में अपनी पत्नी को साथ लेकर ससुर की आज्ञा से चंद्रांगद पुनः अपनी नगरी में आये। महाराज इन्द्रसेन ने अपने पुत्र को राजसिंहासन पर बिठाकर तपस्या द्वारा भगवान शिव की आराधना करके योगी पुरुषों को होने वाली उत्तम गति प्राप्त की।

राजा चंद्रांगद ने अपनी धर्मपत्नी सीमंतिनी के साथ दस हजार वर्षों तक नाना प्रकार के विषयों का उपभोग किया। उन्होंने आठ पुत्रों और एक कन्या को जन्म दिया। सीमंतिनी प्रतिदिन भगवान महेश्वर की पूजा करती हुई अपने स्वामी के साथ सुखपूर्वक रहने लगीं। उसने सोमवार व्रत के प्रभाव से अपना खोया हुआ सौभाग्य प्राप्त किया।

|| इति श्री स्कन्द पुराणानुसार सोमवार व्रत कथा समाप्त ||

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सोमवार व्रत कथा (Somvar Vrat Katha) क्या है?

सोमवार व्रत कथा भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। इसमें सीमंतिनी और चंद्रांगद की कथा का वर्णन है, जिससे यह सिद्ध होता है कि श्रद्धा से किया गया व्रत हर संकट को दूर कर सकता है।

2. सोमवार व्रत (Somvar Vrat) करने से क्या लाभ होते हैं?

सोमवार व्रत करने से विवाह में बाधा दूर होती है, दांपत्य जीवन सुखी होता है, सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती का अखंड आशीर्वाद प्राप्त होता है।

3. Somvar Vrat Katha in Hindi पढ़ने का सही तरीका क्या है?

सोमवार व्रत कथा को सुबह स्नान के बाद, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शिवलिंग के सामने बैठकर श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पढ़ना या सुनना चाहिए।

4. सोमवार व्रत की विधि (Somvar Vrat Vidhi) क्या है?

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाएं, व्रत का संकल्प लें, सोमवार व्रत कथा का पाठ करें और दिन में सात्विक या फलाहार आहार ग्रहण करें।

5. 16 सोमवार व्रत कथा (16 Somvar Vrat Katha) क्या है?

16 सोमवार व्रत कथा एक विशेष व्रत अनुष्ठान है जिसमें लगातार 16 सोमवार तक भगवान शिव की पूजा और कथा का पाठ किया जाता है, जिससे विवाह और जीवन की बड़ी समस्याएं दूर होती हैं।

6. सोमवार व्रत कैसे करें (Somvar Vrat Kaise Kare)?

सोमवार के दिन उपवास रखें, शिव पूजा करें, कथा का पाठ करें और सच्चे मन व भक्तिभाव से शिव-पार्वती की प्रार्थना करें।

7. Somvar Vrat Katha Benefits क्या हैं?

इससे जीवन के दुःख और संकट दूर होते हैं, खोया हुआ सुख-सौभाग्य वापस मिलता है और वैवाहिक जीवन में प्रेम व सामंजस्य बढ़ता है।

8. सोमवार व्रत में क्या खाना चाहिए?

सोमवार व्रत में फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू का आटा आदि का सेवन किया जा सकता है। नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें।

9. Somvar Vrat Rules in Hindi क्या हैं?

मन और वचन से शुद्ध रहें, क्रोध और झूठ से बचें, भगवान शिव का निरंतर ध्यान करें और व्रत के दिन सात्विक आहार लें।

10. सोमवार व्रत उद्यापन विधि (Somvar Vrat Udyapan Vidhi) क्या है?

16 सोमवार व्रत पूर्ण होने पर विधि-विधान से शिव पूजा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं, दान दें और व्रत कथा का पाठ करके उद्यापन संपन्न करें।

11. सोमवार व्रत कथा से शिव पार्वती का आशीर्वाद कैसे मिलता है?

नियमित पाठ और सच्ची श्रद्धा से भगवान शिव और माता पार्वती प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

12. क्या महिलाएं और पुरुष दोनों सोमवार व्रत कर सकते हैं?

हाँ, सोमवार व्रत और कथा का पाठ महिलाएं और पुरुष दोनों समान रूप से कर सकते हैं और शिव कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

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