bhagwan kaha milte hain

भगवान कहाँ मिलते हैं

मित्रो हमारे सभी के मन में एक विचार सदा बना रहता है कि भगवान कहाँ मिलेंगे। वैसे तो ये कोई नहीं जानता किंतु कुछ द्रष्टांत के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि भगवान कहँ मिलेंगे। तथा ये भी जान सकते हैं कि भगवान को खोजना बहुत ही आसान है। या यों कहें कि भगवान से मिलना बहुत आसान है। तो सबसे पहले जानते हैं भगवान के बारे में!

हम सभी ये जानते हैं कि हम सब भगवान की संतान हैं। शात्रानुसार सृष्टि का निर्माण भगवान ने किया। उन्हीं से ऋषि मुनि उत्पन्न हुए और उन्हीं ऋषियों की हम संतान हैं। हम जो अपना गोत्र बताते हैं उसमें किसी न किसी ऋषि मुनि का नाम लेते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हम भगवान की संतान हैं। तो अब चलते हैं प्रश्न को ओर कि भगवान कहा मिलते हैं। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह द्रष्तांत जरूरी है।

एक दिन शाम के समय कुछ अंधेला शुरु हुआ ही था कि एक बूढ़ी माताराम आपनी झोपड़ी के बाहर कुछ खोज रहीं थीं। उन्हें कुछ खोजते हुए देखकर उनकी सहायता के लिए कुछ लोग एकट्ठे हुए उन्होंने माताराम से पूछा माताराम क्या ढूड़ रही हो ? माताराम ने जबाब दिया बेटा हमारी सुई गुम गई है उसे ही ढूड़ रही हूँ। कुछ लोग माताराम की सुई ढूड़ने में मदद करने लगे। धीरे – धीरे अंधेरा बढ़ने लगा तभी उसी भीड़ में से एक सज्जन ने पूछा कि माताराम से पूछो कि सुई गिरी कहाँ है। माताराम से पूछने पर उन्होंने जबाब दिया बेटा में अपनी झोपडी में गुदरी सिल रही थी वहीं हमारी सुई गिर गई। सज्जन ने पुनः कहा अरे माताराम आपकी सुई झोपड़ी के अंदर गिरी और आप उसे बाहर ढूड़ रही हो! माताराम बोलीं बेटा उस समय अंदर अधेरा था किंतु बाहर कुछ उजाला था सो में बाहर ढूड़्ने आ गई। सज्जन बोले माताराम जब सुई अंदर गिरी है तो वो बाहर कैसे मिलेगी! माताराम बोलीं बेटा अंदर तो अंधेरा है तो अंधेरे में सुई कैसे मिलेगी उसे तो उजाले में ही ढूड़ना पड़ेगा। सज्जन फिर बोले माताराम लेकिन सुई है तो अंदर।

कुछ देर मौन रहने के बाद माताराम बोली बेटा यही तो समझाना चाहते हैं कि तुम भगवान को उजाले में ढूड़ते हो वहाँ नहीं खोजते जहाँ वह बैठा है।

मित्रो बात समझ में आ गई होगी। हम भगवान की संतान हैं भगवान हमारे अंदर है उसे कहीं खोजने की जरूरत नहीं है। बाबा तुलसीदास कहते हैं।

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रकट होहिं में जाना॥

 

 

 

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