Vishnu Bhagwan ka sharnagat palan vrat

भगवान का शरणागत पालन व्रत

Vishnu Bhagwan ने अपने शरणागतों के लिए जो व्रत लिया

Vishnu Bhagwan
Vishnu Bhagwan

– आज के इस लेख में हम Vishnu Bhagwan के शरणागत पालन व्रत के बारे में संक्षिप्त चर्चा करेंगे | हां जी भगवान ने अपने शरणागतों के लिए जो व्रत लिया उसी की बात कर रहे हैं |

सकृदेव  प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते |

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद व्रतं  मम || ( वा० रा० ६ | १८| ३३  )

जो कोई एक बार भी ‘ में तुम्हारा हूँ  ‘ – ऐसा कहकर शरणागत होता है उसे में समस्त प्राणियों से निर्भय कर देता हूँ यह मेरा व्रत है |

व्रतों के भेद –vrat कितने प्रकार के होते हैं

Vishnu Bhagwan एक मात्र सबके शरणदाता हैं | अपने भक्तों के लिए उनकी ऐसी कृपा है की वे सबकी कामना के अनुरूप अलग-अलग रूप धारण कर संसार में प्रकट होते हैं |

भक्तचित्तानुशारेण जायते भगवनजः ||

Vishnu Bhagwan ने स्वयं कहा है कि जो भक्त मेरे जिस स्वरूप की अर्चना करना चाहता है में उसकी श्रद्धा को उसी रूप के प्रति स्थिर कर देता हूँ |  

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति |

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम || ( गीता ७ | २१ )

व्रत समस्त कामनाओं का सिद्धि द्वार है शास्त्रों में प्रयोजनवशात विविध व्रतों के विधान अविहित हैं | यह अद्भुत बात है कि एक व्रत हमारे भगवान को भी अत्यंत प्रिय है जिसका परिपालन वे अनादि काल से करते आये हैं और करते रहेंगे | पूर्णकाम भगवान का वह अनुपम व्रत है – आपने शरणागत भक्तों का सर्वथा-सर्वदा परिपालन, जिसे उन्होंने स्वेच्छया स्वीकार्य किया है |

भगवान भक्तवत्सल कहलाते हैं –

Vishnu Bhagwan भक्तवत्सल हैं | अपने दासों के लिए कुछ भी करने में उन्हें संकोच नहीं होता | जिसने एक बार भी अन्तः करण से द्रवित होकर उन्हें पुकार लगा दी बस भगवान को वहां पहुंचते क्षण भर भी नहीं लगता | गजराज की करुण प्रार्थना हो, द्रोपदी की दीन याचना हो अथवा अज्ञानता पूर्वक अजामिल द्वारा लगाई गई पुकार ही क्यों न हो भगवान ने सदा अपने शरणागतों की रक्षा की है | अपने व्रत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ऐसी है कि सर्वस्वतंत्र होकर भी भक्तों के सुख के लिए समस्त प्रकार के संकट सहर्ष स्वीकार्य कर लेते हैं |

राम भगत हित नर तनु धारी | सहि संकट किए साधु सुखारी ||

भक्तों की इच्छाएं पूर्ण करना भगवान का सहज स्वभाव है | 

अपने शरणागत पालन व्रत को स्पष्ट करते हुए भगवान कहते है कि जिसे करोड़ों ब्राम्हणों की हत्या का पाप लगा हो, शरण में आने पर मैं उसका भी परित्याग नहीं करता |

कोटि बिप्र वध लागहिं जाहू | आएँ शरन तजउँ नहिं ताहू ||

पुनः भगवान कहते हैं कि यदि विभीषण भयभीत होकर मेरी शरण में आया है तो में उसे प्राणों की तरह रखुँगा —

जौं सभीत आवा सरनाईं | रखिहउँ ताहि प्राण की नाईं ||

और कृपा सिंधु भगवान ने न केवल विभीषण को अपना आश्रय प्रदान किया, बल्कि लंकाराज्य रूपी वह सम्पदा सौंपी |

जो सम्पति शिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ |

सोइ सम्पदा विभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ||

देवता या राक्षस, मनुष्य या पशु-पक्षी, जिसने जब भी भगवान की शरण ली उसे उन्होंने कभी निराश नहीं किया |

भक्त पर कृपा –

सचमुच भगवान के सामान कृपालु और दृढ़व्रती तो स्वयं भगवान ही हो सकते हैं जिन्होंने महाभारत युद्ध में शस्त्र ग्रहण न करने की अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भक्त भीष्म की उनसे शस्त्र उठवा लेने की प्रतिज्ञा को सत्य प्रमाणित करके अपने शरणागत पालन व्रत का निर्वाह किया | शरणागतों को सद्गति देने वाले ऐसे अटल व्रतधारी भगवान से हमारी बिनती है कि वे अपने चरणों में हमें भी शरण प्रदान करें और हम दीन शरणागतों पर अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाये रखें | 

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इस लेख में Vishnu Bhagwan ने अपने शरणागत व्रत का पालन किया जो हमने संक्षेप में जाना अगले लेख में  भगवान ने जो सत्य का दृढ़व्रत लिया उसके बारे में संक्षेप में चर्चा करेंगे { सत्यसंध दृढ़व्रत रघुराई } 

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